
संजय रावत
रुद्रपुर। पछले अंक में हमने बताया था कि कैसे रुद्रपुर की महायोजना का खुला मछली तालाब नीलामी के बाद रद्द हो गया, पर बोलिदाताओं ने अधिकारियों के साथ सांठ गाँठ कर 17 साल बाद भ्रामक तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायलय को गुमराह कर लखनऊ बेंच से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। आगे भ्रष्टाचार को सबसे पहले तत्कालीन सचिव आवास विकास पी सी शर्मा अपना ईमान इस पोखरे में डूबा बैठे और उक्त भूमि को असंवैधानिक तरीके से फ्रिहोल्ड कर दिया, यही नहीं बचाव का रास्ता निकालते हुए भूमि का खसरा नंबर ही बदल डाला। अब मामले की अगली तहों तक पहुंचे यहाँ यह उल्लेख जरुरी है कि बिल्डर इस भूमि पर 500 करोड़ की लागत से एक बड़े मॉल के निर्माण का सपना संजोए बैठे हैं, जिसे भविष्य में 1500 से 2000 करोड़ में बेचे जाने के मंसूबे पाले बैठे हैं।
अब आगे की कड़ी में हुआ यह कि तमाम चालबाजियों के बावजूद तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा शासन को प्रेषित जाँच रिपोर्ट में फ्रीहोल्ड विलेख को तत्काल निरस्त करने स्पष्ट संस्तुति प्रेषित की गई। पर भ्रष्ट चालबाजों की जुगलबंदी इतने बड़े सपने को आसानी से कैसे बिखरने देती, तो फिर एक नौकरशाह का ईमान फिर पोखरे में डूब गया। इस नौकरशाह का नाम था उदय राज सिंह। उदय राज सिंह ने भूमाफियाओं और एक बिल्डर से ईमान के बदले करोड़ों लेकर तत्कालीन जिलाधिकारी जुगल किशोर पंत और अपार जिलाधिकारी ( नजूल ) जय भारत सिंह फ्रीहोल्ड निरस्त के आदेश के उलट सुविधा जनक धाराओं में एफ आई आर दर्ज कर पिछली गतिमान रिपोर्ट को ही निरस्त कर तीन बढ़िया रास्ते खोल दिए। पहला यह कि विभागीय अनापत्ति सहर्ष प्रदान कर दी गई, दूसरा मॉल निर्माण पर रोक हटा कर दोस्ताना मिशाल पेश की, तीसरा अति दयालुता का परिचय देते हुए उसी दिन मॉल के मानचित्र को स्वीकृति भी प्रदान कर दी।
मामला चलता रुकता बढ़ ही रहा तो इसमें एक नेता जी को भी शामिल कर लिया गया, नेता जी कोई छोटे भ्रष्टाचारी न थे तो उनका हिस्सा तय किया गया।नेता जी अपने नाम से यह काम तो कर नहीं सकते थे चूंकि मामला खटाई में पड़ जाता और नेता जी खुद सवालों के घेरे में पड़ सरकार गवाँ सकते थे, तो नेता जी ने अपने रसूख से अपने हिस्से की 2739 वर्गमीटर भूमि बिना भुगतान के अपने करीबी उद्योगपति के नाम रजिस्ट्री करवा दी, इस पर रसूख का खेल देखिए कि नगरनिगम के मूल दस्तावेज गायब होने के बावजूद दाखिल ख़ारिज भी करा लिया गया।
यह हैरानी की बात ही है कि उक्त दाखिल ख़ारिज माननीय उच्तम न्यायलय, माननीय उच्च न्यायलय NGT के सख्त आदेशों का स्पष्ट धोरे उलंघन ही नहीं दंडनीय अपराध है। कानून की रोशनी में देखें तो तीन हवालों से यह बात प्रमाणित भी होती है। पहला – जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य ( सुप्रीम कोर्ट 2011) के मुताबिक पार्क, नदी, नाले, तालाब /सार्वजनिक भूमि का फ्रीहोल्ड या कब्ज़ा नाजायज है। दूसरा – उत्तराखंड हाईकोर्ट ( 2018 ) के मुताबिक तालाबों से अतिक्रमण हटाकर छः माह के भीतर संरक्षण करना सुनिश्चित करना अनिवार्य है। तीसरा – NGT के मानकों के अनुसार नदी / जलाशय से 200 मीटर तक किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित किया गया है। और यह प्रतिबन्ध उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा भी लगाए गए हैं। बावजूद इन कठोर नियम आदेशों के बावजूद एक सत्ताधारी नेता की सह पर मॉल बनाने का प्रयास किया गया। जो संविधान की घोर अवमानना है।
आज दूसरे भाग की कहानी यहीं तक, आगे कहानी और रोचक होने वाली है।