एक पोखरा ले डूबा कई नौकरशाहो का ईमान

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आजकल एक खबर रोज सुर्खियों में रहती है कि उत्तराखंड सरकार, सरकारी जमीनों से रोज कोई न कोई कब्ज़ा खाली करा रही है, यह केवल खबर ही नहीं बल्कि धरातल पर दिखाई भी दे रहा है और यह काबिल – ए- तारीफ भी है । किनसे और किस तरह की भूमि में काबिज लोगों को हटाया जा रहा है ये यह दूसरी बात है। लेकिन इसके उलट यह भी दिख रहा है कि कुछ लोगों पर यह मुहीम से बाहर रखे गए हैं या यूं कहें कि उन्हें सरकारी जमीन को कब्ज़ाने की मूक सहमती प्रदान की गई है। मामला है उधमसिंह नगर जिले के रुद्रपुर का।

रुद्रपुर की महयोजना में एक एक पोखरा यानी तालाब ‘जलमग्न खुला क्षेत्र’ के रूप में दर्ज है जो किच्छा बाईपास रोड, राजस्व गांव लमरा, खसरा संख्या 2 में ठीक पैरड़ाइज लेक के बगल में स्थित है, जिसका क्षेत्रफल 4.07 एकड़ यानी 16.500 वर्गमीटर है। यह भूमि गड्ढेनुमा है जो बैगुल नदी की जद में आती है। अब मसला यह है कि इस सरकारी तालाब को कुछ बिल्डर और नौकरशाह बेचने की क़वायद कर चुके हैं। प्रशासन शासन मौन और आंखमिचोली का खेल रोज नए राज खोल रहा है, बावजूद इसके कि इस तरह की भूमि का वाणिज़ियिक उपयोग कानूनन प्रतिबंधित है।

उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक कहानी शुरू होती है वर्ष 1988 से, 7 दिसम्बर 1988 को यह भूमि दो वर्षों के लिए केवल मछली पालन के लिए नीलाम की गई। नीलामी में पाँच लोगों ने संयुक्त रूप से ₹ 3,07,000 की उच्तम बोली लगाई, जिसमें से 25 प्रतिशत धनराशि जमा की गई, पर हुआ यह कि इस पर बोली दाताओं ने लिखित सहमती नहीं दी, जिस कारण लीज स्वीकृत ही नहीं हुई। उक्त नीलामी की शर्त 8 के तहत लीज डीड स्वीकृति के बिना किसी को कब्ज़ा नहीं दिया जा सकता, इसलिए बोलीदाता वैध पत्तेदार नहीं बने। खेल तो यहीं खत्म हो जाना चाहिए था पर ऐसा हुआ नहीं।

सात साल की गहन शांति के बाद वर्ष 1995 में बोलिदाताओं और सरकारी मशीनरी के गठजोड़ से भ्रामक तथ्यों के साथ पेश कर इलाहाबाद की बेंच लखनऊ से स्थगन आदेश प्राप्त करने में सफलता हांसिल कर ली। जबकि भूमि मौक़े पर आज भी खाली है। यहाँ से नई पिच पर नया खेल शुरू होता है। नीलामी रद्द होने के 17 साल बाद वर्ष 2005 में एक बोलीदाता महेन्द्र छाबड़ा ने अन्य चार बोलिदाताओं से अपने पक्ष में कुछ शपथपत्र लिए और तत्कालीन सचिव आवास विकास विभाग, पी सी शर्मा के पास पहुँच गए, चुंकि यह भूमि तब तक पुनर्विकास विभाग को स्थानंतरित हो चुकी थी। तो इस पोखरे ने जिस नौकरशाह का ईमान डुबोया वो पी सी शर्मा ही थे, जिन्होंने तीन असंवैधानिक शासनदेश जारी कर डाले, जिनके आधार अवैध मामले को नया बल मिल गया। जिसके तहत वर्ष 2007 में वर्ष 2000 के सर्किल रेट पर उक्त भूमि को वैध दर्शा कर फ्री होल्ड कर दिया गया, जबकि भूमि कानून के तहत यह भूमि फ्री होल्ड की ही नहीं जा सकती।

नई पिच पर भ्रामक तथ्यों के आधार पर जब नया खेल शुरू हो ही चुका तो हर शॉट में नया षडयंत्र लाजमी हैं। तो अगला षड़यंत्र यूं रचा गया कि उक्त भूमि के राजस्व ग्राम लमरा, खसरा. नंबर 2 को काट कर अन्य राजस्व ग्राम ( रामपुरा ) व खसरा संख्या – 156 अंकित कर दिया गया, यानी भूमि वही है पर अब उसका खसरा नंबर बदल गया है। आवेदकों द्वारा उक्त भूखंड को हड़पने के लिए रचे गए षड़यंत्र का पुख्ता प्रमाण है। इसके बाद तो षड़यंत्र में जिलाधिकारीयों से लेकर सचिव स्तर के कई नौकरशाहो के ईमान इस पोखरे में डूबे, मगर आज यह कहानी यहीं तक। कुछ दस्तावेज अभी और आने बांकी है जिनसे उक्त मामले से सम्बन्धित तमाम नौकरशाहो और बिल्डर के नाम सामने आने बांकी हैं जिन सबका ईमान यह पोखरा ले डूबा।


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