
✍🏾 संजय रावत
नार्सिंस्ट आईएफएस संजीव चतुर्वेदी की कई शिकायतें चाहे वह कर्मचारी उत्पीड़न की हों, फर्जी बिलों के द्वारा सरकारी धन के गबन या महिला अधिकारियों द्वारा की गई हों सारी जाचें शासन में मुख्यमंत्री से लेकर , सचिव कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग दिल्ली तक पहुंची हैं। पर अंततः ये जाचें उत्तराखंड के एक मुर्दार एपीसीसीएफ अधिकारी डॉ विवेक पाण्डेय के पास पहुँच जाती हैं, और विवेक पाण्डेय चतुर्वेदी के पापों की सारी शिकायतों की निष्पक्ष जाँच करने के बजाए उन्हें अपने पिछवाड़े दबाए बैठे जाते हैं। पर शिकायतों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है, नौबत यह आ गई है कि शायद चतुर्वेदी के पापों को छिपाने के लिए विवेक पांडेय को डायपर पहनना पड़े। पर चतुर्वेदी के पापों में इतने विषक्त रसायन हैं कि विवेक पाण्डेय का डायपर भी रिसने लगेगा।
पिछले अंक में ‘तो एपीसीसीएफ विवेक पांडेय दबाए बैठे हैं चतुर्वेदी के पापों की पोटली’ नामक शीर्षक वाले लेख में हमने खुलासा किया था कि अक्टूबर माह से तत्कालीन हॉफ ने जाँच अपर प्रमुख वन संरक्षक डॉ. विवेक पाण्डेय को सौंपी थी जिसे विवेक पांडे दबा कर बैठे गए। वे यह भी भूल गए कि जिस जनता के पैसों से उन्हें लाखों रूपए तनख्वाह मिलती है उसी जनता की शिकायतों का निवारण हाथों हाथ कर दिया जाए, पर वे एक नार्सिंस्ट संजीव चतुर्वेदी को बचाने के लिए अपना ईमान ही नहीं बेच रहे बल्कि उत्तराखंड राज्य, देश, समाज के साथ गद्दारी कर अपने परिवार के लिए बद दुआएं बटोर रहे हैं। जनता और अन्य वन कर्मचारियों के खिलाफ वे संजीव चतुर्वेदी के साथ ऐसे खड़े हैं जैसे कोई “गे कपल” हों।
पिछले अंक की खबर में भी अपना पक्ष रखने के लिए उन्होंने फोन नहीं उठाया और कल भी खबर पढ़ने के बावजूदअब भी दोनों नंबरों से फोन नहीं उठाया। पिछली खबर में सूत्रों से पता चला था कि विजिलेंस और शासन द्वारा जाँच किए जाने के आदेश को उन्होंने अपने मन से इसलिए दरकिनार कर दिया कि शिकायतकर्ता द्वारा शपथपत्र नहीं लगाया गया है, वर्ना वे जाँच जरूर करते। पर आज कहानी ने यहाँ नया मोड ले कर यह साबित किया है कि इनका नाम विवेक नहीं बल्कि विवेकहीन होना चाहिए था।
चूंकि इससे पहले की शिकायतों में शिकायतकर्ताओं ने शपथपत्र लगाए हुए हैं। यह उस वक़्त की बात है जब संजीव चतुर्वेदी पर राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद और वन विभाग के तीन कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न एवं अनुचित व्यवहार के आरोप लगाए गए। इन शिकायतों के आधार पर शासन स्तर पर प्रारंभिक जांच भी शुरू हुई । भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी राज्य से इस मामले में रिपोर्ट मांगी। उसी दौरान 25 अगस्त को उनका स्थानांतरण कर उन्हें मुख्य वन संरक्षक/निदेशक, जैविक शोध संस्थान (एफआरआई), हल्द्वानी नियुक्त किया गया। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जांच निष्पक्ष हो और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि शिकायतें किसी दुर्भावना से प्रेरित न हों। यदि प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए गए तो उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की जा सकती है। यह मामला वन विभाग की कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़े करता है।
आज जिस शिकायत का जिक्र हम कर रहे हैं वह शिकायत है लैंसडाउन भूमि वन संरक्षण विभाग के तत्कालीन उप वन क्षेत्राधिकारी कुलदीप पंवार की।
कुलदीप पंवार ने अपने साथ हुए उत्पीड़न की शिकायत राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के माध्यम से 10 जून 2025 को बाकायदा शपथ पत्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से लेकर दिल्ली तक की। जिसकी जाँच भी डॉ. विवेकहीन पांडेय के पास ही पहुंची, जिस पर अब तक जाँच जैसी कोई कार्यवाही नहीं की गई है। आज अब डॉ. विवेकहीन के पास कौन सा बहाना बचता है कि बिना शपथपत्र के जांच नहीं की जा सकती।
यह मामला बहुत गंभीर और संवेदनशील है जिसे वक़्त रहते उत्तराखंड सरकार और उत्तराखंड वन महकमे को हस्तक्षेप करना राज्य, समाज और वन कर्मचारी हित में अपरिहार्य है।