
उत्तराखंड मुक्त विवि में नियमों की खुलेआम लूट,केस नहीं, केस स्टडी बन रही है यह नियुक्ति, यह नियुक्ति नहीं, एक प्रायोजित साजिश है |
देहरादून/हल्द्वानी: अगर नियमों को तोड़कर किसी को लाभ दिया जाए और उसे फिर भी नियुक्त किया जाए, तो क्या इसे नियुक्ति कहेंगे या मिलीभगत? उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति पद पर दोबारा नियुक्ति की कोशिशों ने यही सवाल खड़ा कर दिया है।कुलपति प्रो. ओम प्रकाश नेगी जिनकी उम्र 67 साल हो चुकी है, उन्हें एक बार फिर से विश्वविद्यालय का मुखिया बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
जबकि यूजीसी के नियम, विश्वविद्यालय का ऐक्ट, और तमाम कानूनी प्रक्रियाएं इस पर साफ़ रोक लगाती हैं।
डॉ. भूपेन सिंह, जो उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष हैं, ने शासन को एक गंभीर पत्र लिखा है, जिसमें 8 ठोस तर्कों के साथ ये बताया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों की हत्या है उनका कहना है कि यूजीसी की अधिवार्षिता आयु 65 साल है, जब तक संबंधित विश्वविद्यालय अपने एक्ट में बदलाव न करें, उत्तराखंड मुक्त विवि ने कोई बदलाव नहीं किया, यानी इस विवि में कुलपति बनने की अधिकतम आयु 65 साल ही है। लेकिन ओम प्रकाश नेगी, जिनकी जन्मतिथि 16 जुलाई 1958 है, वो इस सीमा को दो साल पहले ही पार कर चुके हैं।
डॉ. भूपेन सिंह सवाल करते हैं क्या नियम अब सिर्फ कमजोरों के लिए हैं? क्या विश्वविद्यालय अब सत्ता की लॉबी का कैंपस बन गए हैं? उनका दावा है कि इस चयन प्रक्रिया में जानबूझकर ओम प्रकाश नेगी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए नियमों की मनमर्जी व्याख्या की जा रही है। यूजीसी रेगुलेशन 2010 साफ कहता है कि अगर आप 70 वर्ष अधिवार्षिता चाहते हैं, तो पहले एक्ट में संशोधन कीजिए। उत्तराखंड मुक्त विवि ने ऐसा कोई संशोधन नहीं किया। फिर नेगी कैसे पात्र हैं? डॉ. सिंह बताते हैं कि नेगी के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं जिनमेंतीन मुकदमे हाईकोर्ट में दर्ज हैं, इनमें से एक अवैध नियुक्तियों को लेकर उन्होंने खुद किया है। डॉ. रेनू प्रकाश और राकेश रयाल जैसे अधिकारियों की मिलीभगत से गलत फैसले लिए गए। उनका य़ह भी कहना है कि मेरे विरोध करने पर मुझे झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश की जा रही है। मेरी जान को खतरा है।
डॉ. सिंह का कहना है कि यूजीसी 2018 में भी अधिवार्षिता 65 ही बनी रही क्योंकि 2010 के संशोधन को लागू करने के लिए अधिनियम में बदलाव जरूरी था। लेकिन नेगी जी और उनके साथियों ने नियमों को ताक पर रखकर उम्र की सीमा को नजरअंदाज किया।
डॉ. भूपेन सिंह ने पत्र के माध्यम से चेतावनी दी है कि अगर कुलपति चयन की प्रक्रिया से प्रो. ओम प्रकाश नेगी को बाहर नहीं किया गया, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के साथ ही जनता के बीच इस प्रकरण को रखेंगे।
कुल मिलाकर यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, व्यवस्था का टेस्ट है यह मामला तय करेगा कि उत्तराखंड में शिक्षा का शासन नियमों से चलता है या रिश्तों से। यह फैसला सिर्फ एक कुलपति का नहीं, एक पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का है।