दस्तावेजॉन का झोल या सिस्टम की भूल

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देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग द्वारा वन क्षेत्राधिकारी कुलदीप सिंह पवार के निलंबन को लेकर मामला अब एकतरफा कार्रवाई से आगे बढ़कर कानूनी और प्रशासनिक बहस का रूप लेता जा रहा है। विभाग ने जिन आरोपों के आधार पर पवार को निलंबित किया है, उन्हीं आरोपों को पवार ने लिखित स्पष्टीकरण में तथ्यहीन, आधारहीन और कानून के विरुद्ध बताया है।
वन विभाग का कहना है कि कुलदीप पवार के पास ऐसे सरकारी दस्तावेज़ पाए गए, जो गोपनीय और संवेदनशील थे तथा जिन्हें उन्होंने बिना वैधानिक अनुमति के प्राप्त किया। इन्हीं आरोपों के आधार पर उन्हें उत्तराखंड राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली 2002 के नियम 3(1), 3(2) और 9 के उल्लंघन का दोषी मानते हुए निलंबित किया गया।
वहीं पवार का कहना है कि जिन दस्तावेज़ों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, वे न तो गोपनीय हैं और न ही अवैध रूप से प्राप्त किए गए।
कुलदीप पवार ने वन संरक्षक/मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त, हल्द्वानी को भेजे विस्तृत जवाब में स्पष्ट किया है कि जिन दस्तावेज़ों का उपयोग उन्होंने उच्च न्यायालय और लोक सेवा अधिकरण में किया, वे दस्तावेज़ उनके वकीलों द्वारा अपने स्वतंत्र स्रोतों से प्राप्त किए गए, इन दस्तावेज़ों को न तो उन्होंने स्वयं हासिल किया और न ही किसी प्रकार का अनधिकृत संचार किया। पवार ने कहा कि उन्हें कानूनन यह बताने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता कि उनके वकीलों ने दस्तावेज़ कहां से प्राप्त किए।
पवार के अनुसार जिन दस्तावेज़ों को संवेदनशील बताया जा रहा है, वे अधिकारियों के स्थानांतरण, तैनाती, चार्ज ग्रहण/अवमुक्ति और लंबी अवधि के अवकाश से जुड़े हैं।उन्होंने तर्क दिया कि ये सभी सूचनाएं पब्लिक डाक्यूमेंट् की श्रेणी में आती हैं, जिन्हें पहले भी राजकीय गजट में प्रकाशित किया जाता रहा है। पवार का कहना है कि जब सरकारी अधिकारियों का वेतन जनता के टैक्स से दिया जाता है, तो इन जानकारियों को गोपनीय नहीं कहा जा सकता। अपने जवाब में पवार ने एक अहम सवाल उठाया
आज के समय में अधिकारियों के ट्रांसफर और चार्ज से जुड़े आदेश वॉटसएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मिनटों में वायरल हो जाते हैं। अगर यह अवैध है, तो अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उन्होंने कहा कि यदि सोशल मीडिया पर मौजूद ऐसे दस्तावेज़ अपराध की श्रेणी में आते हैं, तो पहले उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।
वन विभाग ने जिन धाराओं बीएनएस 303 (चोरी), बीएनएस 356 (मानहानि), बीएनएस 61 (आपराधिक साजिश) का उल्लेख किया है, उन पर भी पवार ने गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने पूछा कौन सा दस्तावेज़ कब और कहां से चोरी हुआ? किस अधिकारी की मानहानि किस दस्तावेज़ से हुई?किस मामले में आपराधिक साजिश साबित होती है? पवार का कहना है कि बिना ठोस तथ्य के इन धाराओं का उल्लेख केवल डराने का प्रयास है।
पवार ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले अधीक्षक एवं विधिक मामलों के स्मरणकर्ता बनाम सत्येन भौमिक (1981)
और दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी वकील को यह बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि उसने दस्तावेज़ किस स्रोत से प्राप्त किए।इसके अलावा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 126 भी इसी सिद्धांत की पुष्टि करती है। कुलदीप पवार ने यह भी आरोप लगाया है कि एक वरिष्ठ अधिकारी उनसे पहले से व्यक्तिगत दुर्भावना रखते हैं और उसी के चलते उनके खिलाफ यह कार्रवाई की गई है। उन्होंने इसे डराने, दबाव बनाने और मानसिक उत्पीड़न का प्रयास बताया।
इधर वन विभाग का कहना है कि यह कार्रवाई प्रारंभिक जांच के आधार पर की गई है और जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई होगी। वहीं पवार का दावा है कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप कानून और तथ्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाएंगे। कुल मिलाकर यह मामला अब केवल एक निलंबन का नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ों की परिभाषा, पारदर्शिता और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा अहम सवाल बन गया है।


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