
संजय रावत
किसी विभाग को शर्मसार होने के लिए यूं तो कई कारक हो सकते है पर सबसे बड़ा कारक है एक ही प्रक्रिया के लिए जब अलग अलग मापदंड अपनाए जाने लगें। भ्र्ष्टाचार की घनी धुंध में कई विभागों में ऐसा हो सकता है पर वनविभाग उत्तराखंड में यह साफ साफ दिखाई दे रहा है। एक ही विभाग के दो छोटे बड़े अधिकारी, दोनों के वित्तीय अनियमितताओं के एक से मामले, पर एक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो जाँच शुरू हो जाती है पर दूसरे अधिकारी की उच्च स्तरीय शिकायतों के बाद मामला दबा दिया जाता है।
मामला है वन विभाग के एक आई एफ एस और वन विकास निगम के डी एल एम द्वारा की गई वित्तीय अनियमितताओं का। बड़े अधिकारी ने पूरे होश में बड़ा घोटाला किया तो छोटे अधिकारी ने अतिआत्मविश्वास में बनस्पत उच्च अधिकारी के छोटी अनियमितताएं कर डाली। पर फंसा केवल छोटा अधिकारी। बड़ा अधिकारी तो जाँच अधिकारियों को ही फटकार कर खूल्ला घूम रहा है। जाँच अधिकारी शिकायतें दबा कर रिटायर भी हो गए पर जाँच की फाइल अब भी गर्त में कहीं गुम है। छोटा अधिकारी जिस पर मुकदमा दर्ज कर जाँच गतिमान है उस छोटे अधिकारी DLM का नाम है उपेंद्र बर्थवाल। बड़ा अधिकारी जिसके बड़े घोटाले की शासन तक शिकायतें पहुंची हैं वो नार्सिंस्ट आई एफ एस संजीव चतुर्वेदी के नाम से जाना जाता है।
पहले बात करते है DLM उपेंद्र बर्थवाल की जिन पर आरोप है कि उपेंद्र बर्थवाल ने अपने अधीनस्थ को स्थानीय बाजार से रिफ्रेन्समेन्ट और अन्य के फर्जी बिल बनाने के आदेश दिए, अधीनस्थ के इंकार करने पर आरोपितों ने नेगी स्वीट एंड रेस्टोरेंट के नाम से फर्जी बिल बना कर स्वयं पास कर सरकारी धन का गबन किया गया। जबकि इस नाम का कोई रेस्टोरेंट अस्तित्व में ही नहीं है।सरकारी धन से जुड़े इस गंभीर मामले पर हल्द्वानी न्यायलय ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिला नैनीताल के थाना मुखनी को निर्देश दिए हैं कि फर्जी और कूटरचित बिल बना कर सरकारी धन के दुरूपयोग के आरोप में सम्बन्धित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विवेचना की जाए।
इसके उलट दैनिक जनवाणी ने IFS संजीव चतुर्वेदी के ऐसे ही कूटरचित फर्जी बिलों द्वारा सरकारी धन के गबन का मामला प्रकाशित किया था, मामला बिल्कुल ऐसा ही था कि जिन दुकानों के फर्जी बिल बनाकर बड़ा गबन किया गया वो दुकानें भी कहीं अस्तित्व में नहीं थी। फिर मामला शासन के संज्ञान में भी पहुंचा मगर कुछ ज्यादा हलचल नहीं हुई। मामला जब विजिलेन्स ( सतर्कता अधिस्थान ) के संज्ञान में पहुंचा तो विजिलेन्स ने सचिव वन विभाग उत्तराखंड शासन को पत्रांक संख्या सo अo/ शिo प्रा पo118/2025/ 2134 को पत्र प्रेषित किया, जिसमें कहा गया कि संजीव चतुर्वेदी ( आई एफ एस ) अनुसंधान वृत्त हल्द्वानी उत्तराखंड में कार्यरत अधिकारी के विरुद्ध वित्तीय अनियमितताओं को ताक में रखते हुए कच्चे फर्जी बिलों के आधार पर करोड़ों रूपए के घोटाले किए जाने सम्बन्धी कतिपय आरोप है। जिसके बाद अनु सचिव विमल चंद्र भट्ट ने प्रमुख वन संरक्षक ( हौफ ) उत्तराखंड देहरादून को प्रेषित कर कहा गया कि उक्त मामले में शिकायती पत्र का परिक्षण करते हुए नियमानुसार अग्रेतर आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें। यहाँ उल्लेखनीय है कि उस वख्त हौफ समीर सिन्हा थे जिन्होंने ऐसा कोई कष्ट नहीं उठाया और वो समय से रिटायर हो गए। अब मामला नए हॉफ रंजन मिश्र के संज्ञान में मामला है या नहीं यह गर्त में दबी वह फाइल ही बता सकती है। इस मामले पर जब हमने हॉफ रंजन मिश्र से बात की तो उनका कहना था कि मामला अभी मेरे संज्ञान में नहीं है, आपने बताया है तो मैं जरूर इस मामले को देखूंगा।