
संजय रावत
समाज में बच्चों को इंसान बनाने का दौर अब गुजरे ज़माने क़ी बातें हो चली । चेतन-अचेतन तौर पर अभिभावक खुद ही बच्चों को यांत्रिक बनाने पर तुले हुए हैं। परस्पर स्पर्धा, दिखावे और अपने सपनों को बच्चों पर थोपने में अभिभावक गण जितना यथार्थ से कटे हुए दिखते हैं, उससे ज्यादा यथार्थ को समझते हैं आज के शिक्षा माफिया। जिसकी पूंजी के दम ने पूरी व्यवस्था को खरीद संवैधानिक व्यवस्था को भी कठपुतली साबित कर दिया हैं। जहाँ न चेतना क़ी जगह है, न संवेदनाओं क़ी और न ही सृजन क़ी, अधिकारों क़ी बात सोचना तो इनके हिसाब से एक हास्यास्पद कर्म भर है।
अब वो मौसम आ गया है जब पंछियों के पर कतर कर उन्हें एक दड़बे से दूसरे दड़बे में भेज दिया जाएगा। ये पंछी वे विद्यार्थी है जो दसवीं कक्षा पास कर आगे की पढ़ाई संस्थागत न कर उस दड़बे में भेजे जाएंगे जिन्हें कोचिंग इंस्टिट्यूट कहा जाता है। कोचिंग इंस्टिट्यूट वो दड़बे हैं जो संस्थागत पढ़ाई के लिए छद्म स्कूलों में छद्म उपस्थिति भी दर्ज करवा देते है। जबकि विद्यार्थी कोचिंग इंस्टिट्यूट में हाजिर रहते है। यह खेल किसी तहसील या जिला स्तर पर नहीं बल्कि पूरे राज्यभर में खुलेआम चल रहा है। राज्यभर में कोचिंग इंस्टिट्यूट के कई गिरोह काम काम करते जिन्हें हर स्तर पर राज्यसरकार और उसके अधीनस्थ इकाईयों का खुला संरक्षण प्राप्त रहता है।
ये गिरोह और इनके संरक्षक कैसे इस धंधे को परस्पर सहयोग से चलाते है इस पर आगे बात करेंगे पहले यह जान लें कि जाल कैसे बिछाया जाता है। सबसे पहले शहर भर के होर्डिंग्स और अख़बारों में बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित होते हैं जिनमें इन कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़े विद्यार्थियों का महिमामंडन होता है जो वहां से पास आउट हुए होते है, जिनका नाम और रैंक दातों तले अंगुली दबाने को मजबूर करते दिखते हैं। यह सब आम विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए एक प्रलोभन होता है, फिर इस प्रलोभन में खींचे चले आए अभिभावकों को मोटी फीस के साथ यह बताया जाता है कि हम एक ब्रांड हैं – ‘जहाँ पढ़े कई विद्यार्थी नामी डॉक्टर, इंजिनियर और सफल प्रशासक हैं।’इतना सुनते ही अभिभावक कल्पनालोक में विचरने लगते हैं। पर एक सवाल फिर मुँह बाए खड़ा रहता है कि कोचिंग और स्कूल क़ी पढ़ाई के लिए इतना समय कहाँ से चुराया जाएगा।
यहाँ से असल खेल का पता चलता है कि दोनों जगह की पढ़ाई को कैसे मैनेज किया जाएगा। तो आसान सा दिखने वाला विकल्प सुझाया जाता है कि विद्यार्थी पढ़ाई तो इंस्टिट्यूट में ही करेगा लेकिन उसकी संस्थागत पढ़ाई के लिए उसे एक छद्म स्कूल में प्रवेश दिया जाएगा, जहाँ उसे रोज उपस्थित न होकर दस पंद्रह दिन में एक बार जाना होगा ताकि उसकी उपस्थिति लगातार दिखाई जा सके। इस तरह के स्कूलों के लिए एक शब्द भी गढ़ा गया है जिसे ‘डमी क्लासेज’कहा जाता है। ये डमी क्लासेज ही जिला प्रशासन और शासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा किए हुए है।
हमारी टीम ने जब जानने की कोशिस की कि,कोचिंग इंस्टिट्यूट स्थापित करने के लिए कुछ नियम मानक होंगे – मसलन ये किसी सोसायटी या किसी कंपनी के तहत चलाए जाएंगे तो इन्हें कहीं से कोई लाइसेंस लेना होता होगा या कुछ विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना होता हो। हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि कहीं से न कोई लाइसेंस लेना होता है न किसी सम्बन्धित विभाग के कोई अनापत्ति प्रमाणपत्र। जबकि उन्ही विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए स्कूलों को लाइसेंस भी लेना होता है और सम्बन्धित विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी। विचारणीय है कि जिन विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए जहाँ स्कूलों में ढ़ेरों मानक हैं वहीं इन कोचिंग इंस्टिट्यूट के लिए कोई नियम-मानक नहीं बनाए गए है। नागरिक सुरक्षा के लिहाज से यह एक बड़ा सवाल हमारे सामने है, जिसकी सीधी जिम्मेदारी जिलाधिकारियों की बनती है।
अब रुख करते हैं उन डमी स्कूलों की तरफ जहाँ विद्यार्थियों ने प्रवेश तो लिया है पर वहां माह में दो या तीन दिन ही जाते है बतौर पर्यटक। यानी वर्ष भर तीस या चालीस दिन ही स्कूल जाते हैं, जबकि परीक्षा देने के लिए किसी भी विद्यार्थी की पात्रता तभी बनती है जब स्कूल में उसकी उपस्थिति कम से कम 75 प्रतिशत हो। ऐसा हम नहीं कह रहे, यह सी बी एस ई के मानक कहते हैं। यानी यहाँ शिक्षा विभाग को भी पूंजी का गहरा नशा देकर गहरी नींद सुला दिया जाता है। बयाता जाता है कि इन छद्म स्कूलों और कोचिंज इंस्टिट्यूट में उन्नत किस्म के सी- सी टी वी कैमरे भी लगे होते हैं। जिनकी मदद से यदि शिक्षा विभाग या जिला स्तरीय सी.बी. एस.ई.बोर्ड चाहे तो सब कुछ साफ कर नियम मानक लागू करा सकता है। यदि ऐसा हो तो इन कोचिंग इंस्टिट्यूट का वजूद ही खत्म हो जाएगा।
शिक्षा के नाम पर झूठी स्पर्धा में दौड़ने वाले अभिभावक अपने बच्चों की जिंदगी के साथ इतना बड़ा रिस्क कैसे लेते होंगे पता नहीं? पर शिक्षा व अन्य सम्बन्धित विभागों के ऊपर विराजमान जिलाधिकारियों को तो इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिए। आखिर यह शिक्षा से ज्यादा नागरिक सुरक्षा का मामला जो है, जिसके लिए सर्वप्रथम जिलाधिकारी ही जिम्मेदार होते हैं।