तबादलों की राजनीती संविधान से ऊपर तो नहीं

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सेवा नियमावली या सेवा विघटन नीति, जब संवैधानिक अधिकारों को तुगलकी चक्की में पीसा गया

गौरतलब है कि इस मामले में न्यायालय ने 11 फरवरी 2025 को आदेश दिया था कि निगम तीन महीने में ट्रांसफर नीति बनाए। आज जुलाई बीतने को है न कोई नीति, न कोई जवाबदेही। क्या यह अदालत की अवमानना नहीं?
पीड़ित अधिकारियों का कहना है कि अगर उनकी जायज मांगों को न सुना गया, तो वह उच्च न्यायालय और अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष जाने के लिए बाध्य होंगे।
कुल मिलाकर यह उस हर सरकारी संस्था की कहानी है जहाँ सेवा नियमों की किताब को ‘कौन है?’ के सवाल पर बंद कर दिया जाता है। जहाँ योग्यता जाति से छोटी हो जाती है, और अनुभव ‘सिस्टम के अपने लोग’ तय करते हैं। यहां यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं है, पूरे तंत्र से है, कि क्या जातिगत न्याय सिर्फ किताबों में है? क्या सामाजिक न्याय का सपना तबादलों की फाइल में कहीं दब गया है? और अगर ऐसा है तो फिर ये सरकारें किस संविधान की शपथ लेकर काम कर रही हैं?
यह खबर एक आइना है न सिर्फ उत्तराखंड के वन निगम का, बल्कि उस पूरे सिस्टम का जहाँ जाति अब भी हाशिये पर खड़े लोगों का भविष्य तय करती है।


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