
आज से 44 साल पहले जब उमराव जान रिलीज हुई थी तो इसने देश भर में धूम मचा दी थी। मुजफ्फर अली के कुशल निर्देशन, रेखा, फारूख शेख और नसीरुद्दीन शाह के दमदार अभिनय, खय्याम के दिलकश संगीत और आशा भोंसले की खनकती आवाज ने करोड़ों दर्शकों को फिल्म का दीवाना बना दिया था। अब उमराव जान तकनीकी तौर पर और भव्य रूप में 26 जून के देश भर के पीवीआर सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। पेश है वरिष्ठ पत्रकार दीप भट्ट और फिल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म को लेकर लंबी बातचीत के चुनिंदा अंश:
उमराव जान फिल्म की दोबारा रिलीज को लेकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं?
बहुत खुश हूं और उत्साहित भी। सबसे बड़ी चीज है वो इमोशन जिसे चार दशक पहले की पीढ़ी ने इस फिल्म को देखते हुए महसूस किया था। अब उसी इमोशन को फिल्म देखते हुए नई पीढ़ी महसूस करेगी। और इस पीढ़ी का जो अनुभव होगा वह अगली पीढ़ी को मिलेगा। इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस फिल्म से जुड़ती चली जाएगी। अनुभव का विस्तार होता चला जाएगा। इसी तरह कोई फिल्म क्लासिक बनती है और फिर कालजयी हो जाती है।
क्या फिल्म तकनीकी तौर पर पहले से और बेहतर होगी?
अब सिनेमा डिजिटल हो गया है। पहले क्या था कि निगेटिव सेल्यूलाइड वाली तकनीक थी। ये आज के मुकाबले काफी पिछड़ी थी और इस तकनीक से फिल्में बेहतर ढंग से रेस्टोर भी नहीं हो पाती थी। पर अब एडवांस तकनीक है। भारत सरकार की नेशनल हेरिटेज संस्था ने इसे फोर के में डिजिटलाइज्ड फार्म में रेस्टोर किया है, इसलिए फिल्म तकनीकी रूप में पहले से कहीं बेहतर हो गई है।
उमराव जान फिल्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
उत्तर: फिल्म का हर किरदार अपने किरदार में रमा हुआ है। वह उस दुनिया का हो गया है जो उमराव जान की दुनिया थी। वो समय और वो जमाना फिल्म में जीवंत रूप में प्रदर्शित हुआ है। रेखा उसमें डूब गई थी। फारूख शेख, नसीरुद्दीन शाह और अन्य सभी कलाकार अपने किरदारों की दुनिया में इस तरह डूब गए थे कि फिल्म का हर किरदार नेचुरल लगता है। कॉमर्शियल फिल्मों के जितने एक्टर हैं उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे किरदार में डूब सकें। इसीलिए वे दर्शकों की सोल को टच नहीं कर पाते।

रेखा जी फिल्म की दोबारा रिलीज को लेकर कितनी उत्साहित हैं?
बहुत ज्यादा। दरअसल फिल्म की ॲाल इंडिया रिलीज के मौके पर एक किताब भी रिलीज होने जा रही है। इसका शीर्षक है-मुजफ्फर्स उमराव जान। इसे 26 जून को मुंबई बांद्रा स्थित लीडो पीवीआर में रिलीज किया जाएगा। किताब में उमराव जान को लेकर कई फिल्म क्रिटिक्स और फिल्म से जुड़े कलाकारों के आलेख है। रेखा ने फिल्म को लेकर एक कविता लिखी है। कैसे उन्होंने इस किरदार और कहानी को समझा। उस दौर को समझा और फिर कैसे फिल्मकार की इस फिल्म को लेकर सोच को समझा और फिल्मकार से उनका एक राब्ता कायम हुआ। यह सब उन्होंने अपने आलेख में लिखा है।
क्या आपको नहीं लगता कि उमराव जान फिल्म अब पुरानी हो गई है?
इतिहास कभी पुराना नहीं होता। उमराव जान फिल्म का अपना एक दौर है, एक खास समय और समाज है। फिल्म में एक महिला का दर्द है। तो इन सारी चीजों को कैसे पकड़ा गया है, ये सारी बातें उस फिल्म को कालजयी बनाती हैं। वैसे भी समय को अपनी गिरफ्त में लेना सबसे चुनौतीपूर्ण और कठिन काम है। देखिए कुछ ऐसा हुआ कि पहले उस समय और समाज ने हमको पकड़ा और फिर हमने इन्हें पकड़ लिया। फिर तो सभी चीजें संवरती चली गईं और फिल्म उस दौर का एक दस्तावेज सी बन गई। इसीलिए फिल्म दर्शकों की रूह में उतरती चली गई।
फिल्म को हिन्दुस्तान के बाहर के मुल्कों में ले जाने की क्या योजना है?
फिल्म के वर्ल्ड राइट कंट्रोलर संजय जैन हैं। हिन्दुस्तान में प्रीमियर के बाद इसे बाहर के मुल्कों में भी प्रदर्शित किया जाएगा। दूसरे मुल्कों के लोग भी फिल्म को देखने के लिए बेताब हैं। भारत सरकार की नेशनल हेरिटेज संस्था मेरी गमन और अंजुमन के साथ ही सारी फिल्मों को डिजिटलाइज करने जा रही है। तो आने वाले दिनों में इन फिल्मों को भी दोबारा देश भर में रिलीज किया जाएगा।
क्या आपने ओटीटी और नेटफ्लिक्स को भी फिल्म के राइट दिए हैं?
नहीं, मैंने ओटीटी और नेटफ्लिक्स को फिल्म के राइट नहीं दिए हैं। होता क्या है कि फिल्म रिलीज होने के बाद ओटीटी प्लेटफार्म पर चली जाती है। इस लिहाज से यह फिल्म एकदम अछूती है।
फिल्म को लेकर आपकी शूटिंग के दौरान की क्या कोई खास तरह की यादें हैं?
इस फिल्म में एक भूमिका के लिए मैंने नसीरुद्दीन शाह को लिया था। उनकी दिक्कत यह थी कि उन्हें उर्दू नहीं आती थी। पर संवाद में उर्दू लफ्जों को बोलना था। उन्होंने उर्दू के लफ्जों के मानी समझे। जो फिल्में वे उमरावजान से पहले कर चुके थे उन सभी फिल्मों के किरदार इस फिल्म के किरदार से एकदम अलग थे। पहली बार उन्हें ऐसा किरदार निभाना था जो उनकी तब तक की छवि से एकदम अलग था। पहले उनमें किरदार को लेकर थोड़ी असमंजस की स्थिति थी पर जब वे किरदार में उतरते चले गए तो उन्हें मजा आने लगा और एक अलग तरह की अनुभूति उन्हें हुई। अब वे इस किरदार को अपनी जिंदगी का सबसे अहम और एकदम अलग किस्म का किरदार मानते हैं। फिल्म के प्रीमियर में वे मौजूद रहेंगे।
फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?
देखिए उमराव जान का जो पीरियड है उससे किसी भी कलाकार का परिचय नहीं था। यह सबसे बड़ी चुनौती थी। तो उस वक्त को पकड़कर उसको अपने किरदारों में ढालना कोई आसान काम नहीं होता। पर चुनौतियां फेस करने का अपना मजा है। हमने इतिहास के उस खास समय को पकड़ लिया तो राह आसान हो गई। वैसे भी इतिहास दो तरह का होता है। एक इतिहास शर्मिंदा करने वाला भी होता है। पर हमारा इतिहास मानवता का इतिहास है। लोगों को जोड़ने वाला इतिहास है तो फिल्म भी उसी में ढल गई। हमने समय को पकड़ा। उसकी परतें खोलीं। उस वक्त को रंगों में देखा, रोशनी में देखा तो दर्शकों को भी मजा आया।
फिल्म का संगीत पक्ष बहुत मजबूत है। क्या फिल्म के प्रीमियर पर खय्याम साहब को मिस नहीं करेंगे?
खय्याम साहब को मैं उनके जाने के बाद से ही मिस करता रहा हूं। उमराव जान का संगीत उन्होंने उस पीरियड को ध्यान में रखकर इतना मधुर बनाया है कि यह एक तरह से फिल्म की जान है। फिर आशा भोंसले जी की आवाज। फिल्म के गाने शहरयार साहब ने लिखे थे और क्या खूब लिखे थे। दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए..। आज ये दोनों महान शख्सियतें हमारे बीच नहीं हैं। मुंबई में फिल्म के प्रीमियर पर मैं इन दोनों शख्सियों को बहुत मिस करूंगा। आखिरकार फिल्म को महान बनाने में इन दोनों शख्सियतों का कमाल का योगदान था। आज तो फारूख शेख भी इस संसार में नहीं हैं। उन्हें भी मिस करुंगा।
नई पीढ़ी के दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे?
चार दशक बीत चुके हैं फिल्म की रिलीज हुए। इस बीच नई पीढ़ी आ गई है। उनके भी बच्चे आ गए हैं। तो बच्चे अपने मां-बाप की यादें लेकर जाएंगे इस फिल्म को देखने। मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या होगी।