ऐसे फिजूल उत्सवों का खामियाजा अभिभावक झेलते हैं मुख्यमंत्री जी

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रोज रोज की छुट्टियों से अभिवावक जितना परेशान रहते हैं उतना ही मुनाफा प्राइवेट स्कूल के संचालक बेवजह पा जाते हैं। 38 वें राष्ट्रीय खेलों के बहाने अभिभावकों का दर्द सामने आया हैं। आधे अधूरे और उधड़े हुए कथित अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम हल्द्वानी में खेल समापन होने पर जो पूरे शहर के स्कूलों में जबरन छुट्टी घोषित की गई है उससे अभिभावक हथप्रभ हैं और अपने अपने हिसाब से अपना नफा नुकसान भी बता रहे हैं। चुंकि अब वो जमाना नहीं कि हाकिम के हर हुक्म की तमील भी हो और विरोध की आवाज भी किसी के कानों तक न पहुंचे। हालांकि यह बात अलग है कि मुखर विरोध अब भी दिखाई नहीं दे रहा, पर विरोध के स्वर गतिमान होने लगे हैं।

राज्यभर में यह कोई पहला मौका नहीं कि विद्यार्थियों की पढ़ाई और अभिभावकों की अनदेखी कर हुक्मरानों ने प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से जब तब स्कूलों में बेमतलब छुट्टी न करा दी गई हो। हुक्मरानों के अपने निजी कार्यक्रम हों या पार्टी विशेष के कार्यक्रम, सबसे आसान टारगेट हैं स्कूल। जहाँ छुट्टी का एलान सबसे पहले किया जाता है। जिसका सबसे ज्यादा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और अभिभावकों जेब पर पढ़ता है। इसके उलट किसी का कुछ फायदा होता है तो वो हैं स्कूल संचालक।

इस गणित को समझना हो तो कुछ ऐसे समझा जाये, कि देशभर के स्कूलों में 365 दिनों में से सारी छुट्टियां काट कर 280 दिन स्कूल खुलने जरुरी हैं, तांकी विद्यार्थियों की पढ़ाई निरंतर होती रहे। अब अपने आस पास के राज्यों का जायजा लें तो उत्तरप्रदेश, और दिल्ली में भी आकस्मिक अवकाश के बावजूद भी सभी स्कूल करीब 240 दिन तो खुलते ही हैं। मात्र उत्तराखंड ही एक ऐसा राज्य है जहाँ वर्ष भर में बमुश्किल 180 दिन खुलते हैं। इस हिसाब से दूसरे राज्यों की तुलना में उत्तराखंड राज्य में बेवजह 60 दिन यानी दो माह अतिरिक्त छुट्टियां की जाती हैं।

इसका सीधा नुक्सान विद्यार्थियों की पढ़ाई और अभिभावकों की गाढ़ी कमाई पर भी पढ़ता है, पर शतप्रतिशत परीक्षाफल का दावा करने वाले स्कूल संचालक इस बात से खुश ही रहते हैं। क्यूंकि उनके साधन संसाधनों की सीधी बचत जो होती है। मसलन इन 60 दिनों में स्कूल की बिजली, पानी, वाहनों का ईधन और अन्य मेंटिनेन्स आदि आदि का खर्च बचता है। इसके उलट स्कूल और शासन प्रशासन न तो विद्यार्थियों को इस एवज में पढ़ाई के लिए अतिरिक्त समय देने पर विचार करते हैं और न ही फालतू बर्बाद हुए दिनों की फीस में अभिभावकों को कोई राहत देने की बात करते हैं।

अब उत्तराखंड का हर अभिभावक स्कूलों के मुनाफे के गणित को अपने अपने नजरिए से आसपास के स्कूलों का आँकालन खुद भी कर सकता हैं। मसलन यदि जिस स्कूल में आपका बच्चा पढ़ता है, उस स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या यदि एक हजार है और न्यूनतम फीस एक हजार ₹ मासिक है तो उस स्कूल की न्यूनतम मासिक आमदनी दस लाख ₹ हुई। ऐसे में जब उत्तराखंड राज्य के स्कूलों में दो माह अतिरिक्त छुट्टी होने से एक स्कूल संचालक को बीस लाख ₹ का मुनाफा विशुद्ध तौर पर हो जाता है। उस पर साधन संसाधनों की बचत दोयम दर्जे की बात होती है।

दरअसल होना यह चाहिए कि इन 60 दिनों की बर्बादी के बदले विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए स्कूल प्रबंधन अतिरिक्त समय दे या फिर कोई ऐसा शासनादेश जारी हो कि वर्ष के अंत में अभिभावकों को इस अतिरिक्त बोझ से छुटकारा देने क़ी नीति पारित क़ी जाए।


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