
✍🏾 संजय रावत
आईएफएस संजीव चतुर्वेदी आजकल फिर सुर्खियों में हैं। रेमन मेग्सेसे पुरस्कार से सम्माननित पुरस्कार विजेता इतनी घटिया हरकत करेगा ये पाठकों की सोच के बाहर हो सकती है, मगर असल में हुआ यही है। पहले यह जान लें कि यह पुरस्कार दिया किसलिए जता है।’इमर्जेन्ट लीडरशिप’ श्रेणी तहत सार्वजनिक क्षेत्र में ईमानदारी और भ्रस्टाचार उजागर करने के लिए दिया जता है। काश ऐसा भी होता कि भ्रष्टाचार और बेईमानी करने पर यह पुरस्कार वापस व्याज सहित वापस ले लिया जता।
खैर संजीव चतुर्वेदी लम्बे समय से वन अनुसंधान वृत्त में लम्बे समय से इंटरटेनमेंट या अन्य मदों के बहाने फर्जी बिला का भुगतान कर सरकारी धन का गबन करते आरहे हैं जिसकी खबर ‘दैनिक जनवाणी’ ने तत्थयों के के साथ प्रकाशित भी की थी। जिसका असर यह हुआ कि किसी की शिकायत पर वेजिलेन्स (सतर्कता अधिष्ठान) ने इसका संज्ञान लिया और पुलिस अधीक्षक (मु.) जाँच के लिए 25 अगस्त 2025 को एक पत्र शासन (सचिव वन विभाग, उत्तराखंड) को भेजा। शासन ने यह पत्र 6 अक्टूबर 2025 को प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) उत्तराखंड को भेजा की जांच कराई जाए। तत्कालीन हॉफ समीर सिन्हा को चतुर्वेदी इतना डरा आए कि उन्होंने जाँच एपीसीसीएफ (अपर प्रमुख वन संरक्षक) डॉ. विवेक पांडे को सौंप दी। इस पर लगभग अक्टूबर 2025 से संजीव चतुर्वेदी के पापों की पोटली डॉ. विवेक पांडेय दबाए बैठे हैं। जिस राज्य में प्रमाणित भ्रष्टाचार की रिपोर्ट अपर प्रमुख वन संरक्षक सार्वजनिक करने के दबाए बैठे हैं, ऐसे राज्य में जनता के पैसों से जुटाए गए धन की बर्बादी को कैसे रोका जा सकता है।
कई बार ऐसा भी होता है कितो एपीसीसीएफ विवेक पांडेय दबाए बैठे हैं चतुर्वेदी के पापों की पोटली
आईएफएस संजीव चतुर्वेदी आजकल फिर सुर्खियों में हैं। रेमन मेग्सेसे पुरस्कार से सम्माननित पुरस्कार विजेता इतनी घटिया हरकत करेगा ये पाठकों की सोच के बाहर हो सकती है, मगर असल में हुआ यही है। पहले यह जान लें कि यह पुरस्कार दिया किसलिए जता है।’इमर्जेन्ट लीडरशिप’ श्रेणी तहत सार्वजनिक क्षेत्र में ईमानदारी और भ्रस्टाचार उजागर करने के लिए दिया जता है। काश ऐसा भी होता कि भ्रष्टाचार और बेईमानी करने पर यह पुरस्कार वापस व्याज सहित वापस ले लिया जता।
खैर संजीव चतुर्वेदी लम्बे समय से वन अनुसंधान वृत्त में समय समय इंटरटेनमेंट या अन्य मदों के बहाने फर्जी बिला का भुगतान कर सरकारी धन का गबन करते आरहे हैं जिसकी खबर ‘दैनिक जनवाणी’ ने तत्थयों के के साथ प्रकाशित भी की थी। जिसका असर यह हुआ कि किसी की शिकायत पर वेजिलेन्स (सतर्कता अधिष्ठान) ने इसका संज्ञान लिया और पुलिस अधीक्षक (मु.) जाँच के लिए 25 अगस्त 2025 को एक पत्र शासन (सचिव वन विभाग, उत्तराखंड) को भेजा। शासन ने यह पत्र 6 अक्टूबर 2025 को प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) उत्तराखंड को भेजा की जांच कराई जाए। तत्कालीन हॉफ समीर सिन्हा को चतुर्वेदी इतना डरा आए कि उन्होंने जाँच एपीसीसीएफ (अपर प्रमुख वन संरक्षक) डॉ. विवेक पांडे को सौंप दी। इस पर लगभग अक्टूबर 2025 से संजीव चतुर्वेदी के पापों की पोटली डॉ. विवेक पांडेय दबाए बैठे हैं। जिस राज्य में प्रमाणित भ्रष्टाचार की रिपोर्ट अपर प्रमुख वन संरक्षक सार्वजनिक करने के बजाए दबाए बैठे हैं, ऐसे राज्य में जनता के पैसों से जुटाए गए धन की बर्बादी को कैसे रोका जा सकता है।
कई बार ऐसा भी होता है कि गबन के हिस्से से जाँच अधिकारी भी ख़रीदे जा सकते हैं, धन की जरुरत किसे नहीं है पर यह जनता, शासन और राष्ट्र के खिलाफ है तो जाँच अधिकारी को डूब मरना चाहिए। बहरहाल हमने डॉ विवेक पांडे से उनका पक्ष जानना चाहा तो उनके दोनों फोन नहीं उठे तो उनका पक्ष आने की तो बात ही खत्म हुई, पर सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि – डॉ. विवेक पांडे यह बहाना बना रहे कि शिकायतकर्ता ने शपथपत्र नहीं लगाया है। कितने कमाल की बात है कि विजिलेंस और उत्तराखंड शासन को जाँच के लिए शपथ पत्र नहीं चाहिए पर डॉ. विवेक पाण्डेय संजीव चतुर्वेदी के पापों की पोटली इसी झूठी बात के बहाने दबाए बैठे हैं।
संजीव चतुर्वेदी फर्जी बिलों के भुगतान जैसी चिन्दी चोरी में नाम कमा चुके हैं जिनके प्रमाण भी मौजूद हैं। यहाँ एक बात और कहनी है कि जिन दुकानों से फर्जी बिल बनाये गए हैं वो उस पते के मुताबिक अस्तित्व में ही नहीं हैं। ऊपर से उन बिलों में प्रिंटेड नाम, रसीद क्रमांक और जी.एस.टी. नंबर भी मौजूद नहीं हैं। इससे बड़ी एक और बात कि संजीव चतुर्वेदी द्वारा पास किए तमाम बिलों में हस्तलेखन भी एक ही है।
यूं तो चतुर्वेदी इस चिन्दी चोरी को अपना अधिकार क्षेत्र मानते हैं। फिर क्यों दैनिक जनवाणी की टीम इसे गैरकानूनी बता रही है। इनके नियम और धूर्तताएं अपनी जगह पर सरकारी नियम कानून इसके उलट कुछ और ही परिभाषा लिखित रूप में पेश करते हैं। क्या हैं किसी भी रिफ्रेशमेंट या अन्य उपकरणों के खरीद फरोख्त के नियम पहले यह जान लेते हैं। कुछ भी खरीद फरोख्त मामलों पर कुछ बिन्दुओं पर ध्यानाकर्षण अति आवश्यक है। बिलों से प्राप्त अवलोकन से साफ होता है कि
1.मुद्रित विक्रेता का नाम एवं पता नहीं।
सोल्ड को (जिसे बेचा गया) वाला फ़ील्ड कभी हस्तलिखित है, कभी केवल स्टैम्प किया गया है।
जी. एफ.आर. 2017 (नियम 37 एवं नियम 173) तथा मानक ऑडिट प्रथा के अनुसार, किसी भी बिल में आपूर्तिकर्ता का नाम, पता एवं संपर्क विवरण स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए- बेहतर है कि यह मुद्रित हो, केवल स्टैम्प किया हुआ नहीं।
2.क्रमांक (क्रमांक संख्या ) का अभाव।
प्रत्येक वाणिज्यिक बिल- चाहे जी. एस. टी. हो या नॉन जी. एस. टी- में एक विशिष्ट क्रमांक होना अनिवार्य है।
सी. जी. एस. टी./यू. जी. एस. टी. नियम 46(बी) के अनुसार, क्रमिक (लगातार) क्रमांक आवश्यक है (यह नियम 49 के अंतर्गत अपंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं पर भी लागू होता है)।
3.विभिन्न विक्रेताओं के लिए समान प्रारूप और हस्तलेखन।
इससे यह संकेत मिलता है कि ये बिल वास्तव में अलग-अलग विक्रेताओं द्वारा जारी नहीं किए गए हो सकते।
ऑडिट अधिकारी इसे अक्सर गढ़े हुए (कूटरचना) या प्रॉक्सी बिलिंग का संकेत मानते हैं।
4.विक्रेता की पहचान का अभाव।
5.बिलों में विक्रेता का मुद्रित नाम, पूर्ण पता या संपर्क विवरण नहीं है।
इसके बजाय, विक्रेता का नाम स्टैम्प या हस्तलिखित है, और वही हस्तलेखन अलग-अलग विक्रेताओं के कथित बिलों में दिखाई देता है।
यह जी.आर.एफ. नियम 173(3) का उल्लंघन है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि सभी दावों के साथ उचित एवं प्रमाणिक वाउचर हों, जिनसे भुगतान प्राप्तकर्ता की पहचान स्पष्ट हो।
6.क्रमांक और कर/गैर-कर स्थिति का उल्लेख नहीं।
सी.जी.एस.टी./यू.जी.एस.टी. नियम 46(बी) एवं नियम 49 (2017) के अनुसार, प्रत्येक इनवॉइस/बिल में क्रमिक क्रमांक होना चाहिए, और यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपूर्तिकर्ता जी.एस.टी.के अंतर्गत पंजीकृत है या अपंजीकृत। प्रस्तुत बिलों में न तो क्रमांक है और न ही जी.एस.टी.पंजीकरण स्थिति का कोई उल्लेख, जो ऑडिट सत्यापन के लिए अनिवार्य है।
7.समान प्रारूप और हस्तलेखन।
अलग-अलग विक्रेताओं से होने के बावजूद, सभी बिल बिल्कुल एक ही मुद्रित प्रारूप और हस्तलेखन में हैं।
यह गढ़े हुए या प्रॉक्सी बिलिंग की संभावना दर्शाता है।
यह सब भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 463 के अंतर्गत संदिग्ध जालसाजी (धोखाधड़ी ) की श्रेणी में आता है।
8.भुगतान में अनियमितता।
इन खरीदों का भुगतान नकद में विभागीय स्टाफ को किया गया, न कि सीधे विक्रेता के बैंक खाते में। यह जी.आर.एफ.नियम 6(1) एवं नियम 40 का उल्लंघन है, जिनके अनुसार सरकारी भुगतान सामान्यतः ई-भुगतान के माध्यम से सीधे प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में किया जाना चाहिए। नकद भुगतान केवल विधिवत दर्ज किए गए अपवादात्मक मामलों में ही किया जाना चाहिए।
9.उचित बिल हेडर के बिना हस्तलिखित बिल।
अपंजीकृत विक्रेताओं के मामले में भी, बिल में निम्नलिखित होना चाहिए:
विक्रेता का पूरा नाम और पता,
तिथि, क्रमांक, विवरण, मात्रा, दर और राशि।
यहाँ मात्र कुछ ही बिन्दुओं पर बात हुई है बांकी नियमों की लम्बी पोथी है। इतना सब असंवैधानिक होने के बाद उक्त अधिकारीगण ऑडिट में बच कैसे निकले, यह सावल ऑडिट टीम पर भी सवाल खडे करता है। सरकारी धन के गबन पर एक शिकायत पर डी.एस.एम. उपेंद्र सिंह बर्थवाल तो अग्रिम ज़मानत ले आए पर उनके दो सहयोगी अब भी सुचारु रूप से कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन हथप्रभ करने वाली बात यह है कि फर्जी बिलों के भुगतान और सरकारी धन के गबन में आई.एफ.एस. संजीव चतुर्वेदी की कूटरचनाओं का संज्ञान लेकर विजिलेन्स ने शासन को पत्र भी लिखा जो बड़े दिनों तक फाइलों में आराम फरमाता रहा, पर कई दबाओं के चलते जाँच तत्कालीन हॉफ समीर सिन्हा को सौंप दी गईं। इस जाँच की आंच में झुलसने से पहले ही समीर सिन्हा सेवानिवृत्त हो पाप का पिटारा छोड़ गए।
इस मामले पर तीन दिन पहले हमारी नए हॉफ रंजन मिश्र से बात हुई तो उनका कहना था कि यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है, पर में इसे निकलवा कर देखूंगा तभी कुछ बता पाउँगा।
ये पढ़े लिखे अधिकारी अपने ईमान को रोंद कर चिन्दी चोरी करते रहते हैं और शासन प्रशासन खच्चर बेच के सोया रहता है। यही काम किसी लिपिक या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने किया होता तो अब तक जेल में पड़ा सड़ रहा होता। ऐसा नहीं कि इन महानुभावों के साथ ऐसा नहीं होगा या ये बच निकलेंगे यह संभव नहीं है।क्या डॉ. विवेक पांडेय खुद का विवेक गिरवी रख चुके है। गबन के हिस्से से जाँच अधिकारी भी ख़रीदे जा सकते हैं, धन की जरुरत किसे नहीं है पर यह जनता, शासन और राष्ट्र के खिलाफ है तो जाँच अधिकारी को डूब मरना चाहिए। बहरहाल हमने डॉ विवेक पांडे से उनका पक्ष जानना चाहा तो उनके दोनों फोन नहीं उठे तो उनका पक्ष आने की तो बात ही खत्म हुई, पर सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि – डॉ. विवेक पांडे यह बहाना बना रहे कि शिकायतकर्ता ने शपथपत्र नहीं लगाया है। कितने कमाल की बात है कि विजिलेंस और उत्तराखंड शासन को जाँच के लिए शपथ पत्र नहीं चाहिए पर डॉ. विवेक पाण्डेय संजीव चतुर्वेदी के पापों की पोटली इसी झूठी बात के बहाने दबाए बैठे हैं।
संजीव चतुर्वेदी फर्जी बिलों के भुगतान जैसी चिन्दी चोरी में नाम कमा चुके हैं जिनके प्रमाण भी मौजूद हैं। यहाँ एक बात और कहनी है कि जिन दुकानों से फर्जी बिल बनाये गए हैं वो उस पते के मुताबिक अस्तित्व में ही नहीं हैं। ऊपर से उन बिलों में प्रिंटेड नाम, रसीद क्रमांक और जी.एस.टी. नंबर भी मौजूद नहीं हैं। इससे बड़ी एक और बात कि संजीव चतुर्वेदी द्वारा पास किए तमाम बिलों में हस्तलेखन भी एक ही है।
यूं तो चतुर्वेदी इस चिन्दी चोरी को अपना अधिकार क्षेत्र मानते हैं। फिर क्यों दैनिक जनवाणी की टीम इसे गैरकानूनी बता रही है। इनके नियम और धूर्तताएं अपनी जगह पर सरकारी नियम कानून इसके उलट कुछ और ही परिभाषा लिखित रूप में पेश करते हैं। क्या हैं किसी भी रिफ्रेशमेंट या अन्य उपकरणों के खरीद फरोख्त के नियम पहले यह जान लेते हैं। कुछ भी खरीद फरोख्त मामलों पर कुछ बिन्दुओं पर ध्यानाकर्षण अति आवश्यक है। बिलों से प्राप्त अवलोकन से साफ होता है कि
1.मुद्रित विक्रेता का नाम एवं पता नहीं।
सोल्ड को (जिसे बेचा गया) वाला फ़ील्ड कभी हस्तलिखित है, कभी केवल स्टैम्प किया गया है।
जी. एफ.आर. 2017 (नियम 37 एवं नियम 173) तथा मानक ऑडिट प्रथा के अनुसार, किसी भी बिल में आपूर्तिकर्ता का नाम, पता एवं संपर्क विवरण स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए- बेहतर है कि यह मुद्रित हो, केवल स्टैम्प किया हुआ नहीं।
2.क्रमांक (क्रमांक संख्या ) का अभाव।
प्रत्येक वाणिज्यिक बिल- चाहे जी. एस. टी. हो या नॉन जी. एस. टी- में एक विशिष्ट क्रमांक होना अनिवार्य है।
सी. जी. एस. टी./यू. जी. एस. टी. नियम 46(बी) के अनुसार, क्रमिक (लगातार) क्रमांक आवश्यक है (यह नियम 49 के अंतर्गत अपंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं पर भी लागू होता है)।
3.विभिन्न विक्रेताओं के लिए समान प्रारूप और हस्तलेखन।
इससे यह संकेत मिलता है कि ये बिल वास्तव में अलग-अलग विक्रेताओं द्वारा जारी नहीं किए गए हो सकते।
ऑडिट अधिकारी इसे अक्सर गढ़े हुए (कूटरचना) या प्रॉक्सी बिलिंग का संकेत मानते हैं।
4.विक्रेता की पहचान का अभाव।
5.बिलों में विक्रेता का मुद्रित नाम, पूर्ण पता या संपर्क विवरण नहीं है।
इसके बजाय, विक्रेता का नाम स्टैम्प या हस्तलिखित है, और वही हस्तलेखन अलग-अलग विक्रेताओं के कथित बिलों में दिखाई देता है।
यह जी.आर.एफ. नियम 173(3) का उल्लंघन है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि सभी दावों के साथ उचित एवं प्रमाणिक वाउचर हों, जिनसे भुगतान प्राप्तकर्ता की पहचान स्पष्ट हो।
6.क्रमांक और कर/गैर-कर स्थिति का उल्लेख नहीं।
सी.जी.एस.टी./यू.जी.एस.टी. नियम 46(बी) एवं नियम 49 (2017) के अनुसार, प्रत्येक इनवॉइस/बिल में क्रमिक क्रमांक होना चाहिए, और यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपूर्तिकर्ता जी.एस.टी.के अंतर्गत पंजीकृत है या अपंजीकृत। प्रस्तुत बिलों में न तो क्रमांक है और न ही जी.एस.टी.पंजीकरण स्थिति का कोई उल्लेख, जो ऑडिट सत्यापन के लिए अनिवार्य है।
7.समान प्रारूप और हस्तलेखन।
अलग-अलग विक्रेताओं से होने के बावजूद, सभी बिल बिल्कुल एक ही मुद्रित प्रारूप और हस्तलेखन में हैं।
यह गढ़े हुए या प्रॉक्सी बिलिंग की संभावना दर्शाता है।
यह सब भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 463 के अंतर्गत संदिग्ध जालसाजी (धोखाधड़ी ) की श्रेणी में आता है।
8.भुगतान में अनियमितता।
इन खरीदों का भुगतान नकद में विभागीय स्टाफ को किया गया, न कि सीधे विक्रेता के बैंक खाते में। यह जी.आर.एफ.नियम 6(1) एवं नियम 40 का उल्लंघन है, जिनके अनुसार सरकारी भुगतान सामान्यतः ई-भुगतान के माध्यम से सीधे प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में किया जाना चाहिए। नकद भुगतान केवल विधिवत दर्ज किए गए अपवादात्मक मामलों में ही किया जाना चाहिए।
9.उचित बिल हेडर के बिना हस्तलिखित बिल।
अपंजीकृत विक्रेताओं के मामले में भी, बिल में निम्नलिखित होना चाहिए:
विक्रेता का पूरा नाम और पता,
तिथि, क्रमांक, विवरण, मात्रा, दर और राशि।
यहाँ मात्र कुछ ही बिन्दुओं पर बात हुई है बांकी नियमों की लम्बी पोथी है। इतना सब असंवैधानिक होने के बाद उक्त अधिकारीगण ऑडिट में बच कैसे निकले, यह सावल ऑडिट टीम पर भी सवाल खडे करता है। सरकारी धन के गबन पर एक शिकायत पर डी.एस.एम. उपेंद्र सिंह बर्थवाल तो अग्रिम ज़मानत ले आए पर उनके दो सहयोगी अब भी सुचारु रूप से कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। *लेकिन हथप्रभ करने वाली बात यह है कि फर्जी बिलों के भुगतान और सरकारी धन के गबन में आई.एफ.एस. संजीव चतुर्वेदी की कूटरचनाओं का संज्ञान लेकर विजिलेन्स ने शासन को पत्र भी लिखा जो बड़े दिनों तक फाइलों में आराम फरमाता रहा,
ये पढ़े लिखे अधिकारी अपने ईमान को रोंद कर चिन्दी चोरी करते रहते हैं और शासन प्रशासन खच्चर बेच के सोया रहता है। यही काम किसी लिपिक या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने किया होता तो अब तक जेल में पड़ा सड़ रहा होता। ऐसा नहीं कि इन महानुभावों के साथ ऐसा नहीं होगा या ये बच निकलेंगे यह संभव नहीं है।फिलहाल ऐसा लगता हैं कि डॉ. विवेक पांडेय खुद का विवेक गिरवी रख चुके है।