
‘शिक्षकों से संवाद’ की पहली कड़ी में हम इंस्प्रेशन स्कूल के संस्थापक दीपक बलुटिया जी से संवाद कर रहे हैं । दीपक बलुटिया राजनैतिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जो उत्तराखंड के जनपद नैनीताल में हल्द्वानी निवासी हैं । स्वाधीनता दिवस की 75 वीं वर्षगांठ पर उनसे संजय रावत की बातचीत में हमारे सहयोगी हैं तरुण पांडेय । पेश है उनसे लंबे संवाद के कुछ अंश ।
सबसे पहले हमारे पाठकों को अपनी शिक्षा यात्रा के बारे में कुछ बताएं
मेरी प्रायमरी एजुकेशन निर्मला कनवेंट में हुई, फिर स्नातक की पढ़ाई एम बी पी जी हल्द्वानी । फिर परास्नातक और एम बी ए बाहर से किया । मेरे पिता खुद एक शिक्षक रहे है । 1999 में मैंने अपने स्कूल की स्थापना की जिसकी यात्रा को अब 23 वर्ष हो गए हैं ।
स्कूल खोलने का ख्याल कैसे आया आपको
आज तो पूरा शहर एजुकेशन हब बन चुका पर तब मुझे लगता था कि हमारे शहर को और बेहतर स्कूल की जरूरत है। तब आसपास के पहाड़ी इलाकों से लोग पढ़ाई के लिए हल्द्वानी, बरेली, लखनऊ या दिल्ली जाया करते थे । मेरा मानना है कि किसी देश के उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षा एक बुनियादी जरूरत है , अच्छी शिक्षा के बिना हम अच्छे कर्णधार पैदा नहीं कर सकते ।
अभी जो शिक्षा व्यवस्था का हाल है इसकी दिशा दशा से आप इत्तफाक रखते हैं महसूस करते हैं कि इसमें आमूल चूल बदलाव की जरूरत है जरूरत महसूसते हैं
इसमें भारी बदलाव की जरूरत का हिमायती हूूँ मैं ।पर पहले जरूरत इस बात की है कि देश का हर नागरिक शिक्षित बनाने की स्थिति में तो पहुंचें हम, इस आजाद भारत का एक बड़ा तबका तो अब तक शिक्षा से महरूम है। हालात ये हैं कि भोजन के बहाने बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाने का काम हो रहा है जो बहुत शर्मनाक स्थिति है। देश में किसी की भी सरकार हो उसकी जिम्मेदारी है कि वो हर नागरिक को शिक्षा प्रदान करने का काम करे। यह सब तब है जब कि ‘राइट टू फ्री एण्ड कम्पलसरी एजूकेशन एक्ट’ अस्तित्वमान है। बावजूद इसके हम देश के बडे़ तबके को शिक्षा प्रदान करने में विफल रहे हैं। पहले ये सब तो अमल में लायें सरकारें। शिक्षा पद्धति में बदलाव भी हो ही जायेगा समय के साथ।
जैसा आपने पहले कहा है कि हल्द्वानी एक एजूकेशनल हब बन चुका है। पर इन शिक्षित बच्चों में तो नैतिक मूल्य और सामाजिक सरोकार कहीं नजर ही नहीं आते हैं।
नैतिक मूल्यों के पतन के लिए सिर्फ स्कूल ही जिम्मेदार नहीं होते, ऐसा मेरा मानना है। संयुक्त परिवारों से एकल परिवारों तक की यात्रा बड़ा कारण जिम्मेदार लगता है मुझे नैतिक मूल्यों के पतन का। संयुक्त परिवार में बच्चा चेतन व अचेतन रूप से अपने दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, बुआ आदि से कुछ परम्परागत संस्कार सीख ही लेता था। एकल परिवारों ने ये सब कुछ खत्म कर दिया। माता-पिता को समय नहीं है बच्चों से बात करने का क्यों कि वो नौकरी करने में पैसा कमाने में ही थक जाते हैं। वो बच्चों को साधन संसाधन रूपया तो उपलब्ध करा देते हैं पर असल चीज समय नहीं दे पाते हैं। स्कूल में बच्चा सिर्फ पढ़ाई ही कर पाता है। नैतिक मूल्य पढ़ाई का हिस्सा हैं पर वो हिस्सा भर ही हैं। रहा समाज तो समाज ही कई सारे हिस्सों में बंटा है फिर कैसे उम्मीद करें नैतिक मूल्यों की।
तो माना यह जाय कि आजादी के इन 75 सालों में हमें शिक्षा व्यवस्था ने इतना शिक्षित किया है कि सबको अकेला बना छोड़ा है ।
जी बेशक। मैं अभी कहीं पढ़ रहा था कि महाराष्ट्र में एक कानून है कि जो अपने वृद्ध माता-पिता का ख्याल ठीक से न रखे और इस बात की शिकायत हो जाये तो छः माह की सजा होती है। कितनी बड़ी बिडम्बना है कि जिन माता पिता की सेवा करना हमारी परम्परा, दायित्व व मूलयों का हिस्सा है उसके लिए हम आज कानून का सहारा लेने को मजबूर हैं । इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि शिक्षा किस तरफ का रूख अख्तियार कर चुकी है। शिक्षा क्षेत्र में असफलता का इससे बड़ा पैमाना और क्या हो सकता है। माता पिता का ध्यान बच्चा नहीं रखेगा तो और कौन रखेगा। परिवार बनाने संभालने में माता पिता और दादा दादी की बड़ी भूमिका होती है अब ये बच्चों को महसूस हो न हो तो क्या किया जाय। वो तो बच्चों को संस्कारवाने बनाने की हर कोशिश में लगे रहते हैं, कैसे कैसे हर मोर्चे पर बच्चों को परिवार को संभालते हैं। पर एकल परिवार की अवधारणा ने सब कुछ तहस नहस कर दिया है।

मेरा ख्याल है कि आप भी मूल्यों के हिसाब से दो पीढ़ियों के अन्तर को देख चुके हैं पहले स्कूल में बहुत पिटाई खाने के बाद भी शिक्षक सम्मान पा जाते थे पर अब स्कूल के बाद शिक्षकों की पिटाई आम हो चुकी है।
फर्क तो बहुत है दोनों पीढ़ियों के मूल्यों में पर शिक्षक इसके लिए खुद भी जिम्मेदार हैं । बहुत सारे शिक्षक आज भी अच्छा काम कर रहे हैं पर कुछ हैं जो बिल्कुल व्यवसायिक हो चले हैं। यह शिक्षक पर ही निर्भर करता है कि वह किस तरह का शिक्षक साबित हो रहा है जब तक बच्चों के साथ आत्मीय व्यवहार नहीं रखेंगे तब तक यह सब रोज होता रहेगा। एक छोटी सी बात समझनी चाहिए कि सम्मान दोगे तो ही तो पाओगे, फिर चाहे बच्चे हों या फिर किसी और नागरिक ।
अभी हम स्वाधीन होने की 75वीं वर्षगांठ यानी अमृत महोत्सव मनाने जा रहे हैं जहाॅ हर घर में तिरंगा लहराना तय हुआ है। अधिकांश जनता इस महोत्सव में मन से शामिल होती नजर नही आ रही है। हर घर में झंडा लहराना तो राष्ट्रवादी होने का प्रतीक नही हो सकता। इस बारे में आपका क्या सोचना है।
बहुत अच्छा सवाल किया आपने। ये चीज बड़ी बेचैन कर रही थी मुझे। हम अमृत महोत्सव मना तो रहे हैं पर ज्यादा बेहतर होता कि हम अपनी विफलताओं का ईमानदारी से आकलन करते और नयी रणनीति पर कुछ कारगर पहल करते। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, महंगाई जैसे तमाम मोर्चो पर हम विफल रहे हैं फिर भी हम मजबूर हैं अपना 75वें स्वाधीनता दिवस को अमृत महोत्सव के रूप में मनाने को।
हमारे देश में आदमी की औसतम उम्र 70 से 75 वर्ष बतायी जाती है इस उम्र में आदमी सारी सीढ़ियां चढ़ चुका होता है। इस हिसाब से इन 75 वर्षो में देश तमाम ऊँचाईयाॅ छू चुका होता पर हालात इसके उलट ही दिखाई देते हैं।
कितनी बड़ी विडम्बना है इस देश की, हम कोई भी त्यौहार खुशी से तभी मना पाते हैं जब हम उसमें आत्मिक सुख पाते हैं। अब मेरे घर में खाने को राशन नही है, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नही दे सकता, मेरे बच्चे बेरोजगार हैं, पूरा घर असुरक्षित बिखरा पड़ा है। अब ऐसे हालात में मैं कैसे खुश हो सकता हूॅ। मैं खुश होऊँगा तो निश्चित तौर पर 75वां ही क्यों हर वर्ष स्वाधीनता दिवस उल्लास से मनाऊँगा, मैं स्वाधीनता दिवस ही क्या गणतंत्र दिवस भी उसी उल्लास से मनाऊँगा। जब मेरे घर मेरी जिन्दगी में कुछ अच्छा नही चल रहा है और आप मुझसे अपेक्षा कर रहे हैं कि मैं अमृत महोत्सव में झूमूं नाचूँ गाऊँ।
जितनी तेज रफ्तार से स्कूल, कालेज और तकनीकी संस्थान खुलते जा रहे हैं उतनी ही तेजी से बेरोजगारी, अपराध, और मानसिक विकृतियाँ भी बढ़ती जा रही हैं। आपका नजरिया क्या कहता है।
ये तो बहुत बड़ी बहस का मुद्दा है कि जिन नीतियाॅ के माध्यम से सपनों भरा संसार दिखाया जा रहा है सारे परिणाम बिलकुल उसके उलट नजर आ रहे हैं। दरसल सारे स्कूल सारे संस्थान पुराने ढर्रे पर चलते चले आ रहे हैं कहीं भी किसी बच्चे का कौशल अवलोकन नही किया जाता है। होना तो यह चाहिए कि बच्चे के कौशल अवलोकन के बाद इसे कुछ खास विषय की ट्रेनिंग दी जाती, पर हमारे देश में ऐसा कोई आधारभूत ढाॅचा तैयार ही नही किया गया है इसलिए इस तरह के परिणाम सामने हैं।
बातें कुछ और की जाती पर समय अभाव । आप अपनी तरफ से कुछ कहना चाहें तो कह सकते हैं।
कुछ क्या बहुत सारी बाते हैं जिसमें हफ्तों का समय लग सकता है । आप भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। खैर फिर कभी …
अच्छे सवाल किए आपने ।अंत में यही कहना चाहूँगा कि माना यह दौर बेवसी का है पर नाउम्मीद नही हूँ मैं।