
✍🏾 संजय रावत
देहरादून /हल्द्वानी। वन विकास निगम पूर्वी में डीएसएम यानी डिपो साहिब मैनेजर उपेंद्र सिंह बर्थवाल 2024 बैच के हैं। यह पद डिपो प्रबंधन, तस्करी रोकना और अवैध लकड़ी पकड़ना इनके कार्यों में मुख्य रूप से शामिल है, यह पद वन विकास निगम के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण पद है। लेकिन इनके दो वर्ष के प्रशिक्षण के दौरान एक न्युक्ति पत्र जारी होता है जिसमें कई सारे बिंदु चेतावनी के साथ लिखे गए होते हैं मसलन – यह न्युक्ति पर्णतः अस्थाई/ औपबंधिक है। यदि किसी अभ्यर्थी के सवास्थ्य परिक्षण, चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन, शैक्षिक अर्हता तथा आरक्षण श्रेणी सम्बन्धी प्रमाण – पत्रों इत्यादि के संबंध में कोई प्रतिकूल तथ्य प्रकाश में आता है, तो उक्त न्युक्ति को स्वतः ही समाप्त समझा जाएगा। अब इस बिंदु में चरित्र का उल्लेख भी है उदाहरण के तौर पर अमूक अधिकारी किसी खास ठेकदार पर मेहरबान हो उसे लकड़ी तस्करी का मौका दे कर आँखें मूंद ले, तो यह भी चरित्र की ही अवधारणा में शामिल होता है। इसका जिक्र हम आगे करेंगे।खैर यह तो रही मात्र एक बिंदु की बात।
थोड़ा फ़्लैशबैक में जाएं तो उत्तराखंड लोक सेवा आयोग, हरिद्वार द्वारा आयोजित सहायक वन संरक्षक परीक्षा – 2019 के आधार पर चयनोपरांत न्युक्ति के बाद अभ्यार्थियों को केंद्रीय अकादमी राज्य वन सेवा, कोयम्बटूर, तमिलनाडू में एक अप्रैल 2022 से वानिकी एवं सम्बद्ध विषयों में दो वर्षों अनुदेश पाठ्यक्रम और व्यावहारिक प्रशिक्षण हेतु शर्तों / प्रतिबधों के अधीन आस्थाई / औपबंधिक आधार पर नियक्ति करते हुए दो वर्षों की परिवीक्षा पर रखे जाने की माननीय राजयपाल ने सहर्ष स्वीकृति प्रदान की। इस प्रशिक्षण में अलग अलग जगहों और राज्यों से कुल 43 अभ्यर्थियों ने हिस्सेदारी की थी, जिस नाते ये बैच 2024 के अधिकारी कहलाए। हैरत वाली बात यह है कि उक्त में से सभी का स्थाईकारण हो गया, सिवाए उपेंद्र सिंह बर्थवाल के, उपेंद्र साहब ओबीसी कोटे से आते हैं पर यह वजह नहीं बनती कि समय पर स्थाईकरण न किया जाए।
“दैनिक जनवाणी” टीम की विवेचना में यह तथ्य सामने आए की न्युक्ति के बाद ये सचिवालय में रहे जहाँ इन्होंने उच्च अधिकारियों के बीच होने वाली अदृश्य लड़ाईयों में बतौर एक अच्छे ड्राफ्टमैन (यानी किसी प्रपत्र को कैसे लिखा जाए कि वो बेहद असरदार हो जाए) की भूमिका निभाई। इनके इस काम से इनकी प्रसिद्धि भी बड़ी और कई अधिकारी अपने प्रतिद्वंदीयों को धूल चटाने के लिए इनसे ड्राफ्टिंग कराने लगे तो कुछ इनसे नाराज भी हुए। अच्छी ड्राफ्टिंग के बारे में जब इनसे पूछा गया तो इनका कहना था कि छात्र जीवन में मैं वामपंथियों की संगत में था, वहीं से पढ़ाई और लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।
उसके बाद उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें बतौर ईनाम हल्द्वानी डीएलएम और डीएसएम दोनों पदों से एक साथ नवाजा गया। पर ये भूल गए कि कुछ रुष्ट अधिकारी इनके क्रिया कलापों में नजर रहे हुए हैं। वन विकास निगम के सारे ठेके ये कुछ खास लोगों को अपनी मर्जी से देने लगे और यह सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है। इनके चहेते ठेकेदारों में सबसे ऊपर भीष्म गाँधी का नाम आता है। मजेदार बात यह भी कि डीएलएम ऑफिस भी भीष्म गाँधी की ही ईमारत में किराए पर है। इनके चरित्र का सबसे बड़ा उदाहरण यह कि लौट का आवंटन चाहे टेंडर प्रक्रिया से हो या अन्य प्रक्रिया से सबसे ज्यादा लौट भीष्म गाँधी को ही मिलते हैं। हालात यह हैं कि भीष्म गाँधी को इतना काम दिया गया है कि वो खुद अकेला उन्हें नहीं कर पता है तो पैटी ठेकेदारों को दे देता है, जो नियम विरुद्ध है। फाइलों में यह सब घाटे के सौदे दिखाए जाते हैं पर इनकी आड़ में जंगलों का अवैध कटान होता है। प्रमाण के तौर पर सोचिए कि जो टेंडर 500 रूपए का हो और ठेकेदार उसे 150 रूपए भर कर अपना ले, ऐसे घाटे वाले सौदे में जंगल नहीं काटेंगे तो और मुनाफा कैसे हो सकता है।
ऐसी कई बातें और फर्जी बिलों के मामले शासन की नजरों में हैं शायद जिस वजह से उपेंद्र बर्थवाल साहब का स्थाईकरण नहीं हो पा रहा है। अभ्यर्थीयों के न्युक्ति पत्र के बिंदु चार में जो लिखा गया है वह गौर करने लायक है। बिंदु चार कहता है कि – परिवीक्षा अवधि तथा विहित प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूर्ण करने में असफल रहने या संतोष प्रदान करने में अन्यथा विफल रहने की स्थिति में अभ्यर्थी की नियुक्ति / सेवाएं स्वतः ही समाप्त समझी जाएंगी। अब टेंडर प्रक्रिया में धांधली, जंगलों का अवैध कटान यदि शासन के लिए संतोष जनक कार्य है तो उपेंद्र बर्थवाल साहब को पदासीन रहना चाहिए क्या।हालांकि इन्हें अब डीएलएम पद से मुक्त कर दिया है।