
संजय रावत
शूटिंग खिलाडियों के पिस्टल- रायफल की खरीद के लिए अन्य विभाग भी कर सकते हैं मदद। बस ये उनके विवेक, मंशा और मस्तिष्क संरचना पर निर्भर है…
देहरादून / हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में चल रहे खेल आयोजनों में से एक खेल शूटिंग का भी था, जहाँ हल्द्वानी के शूटिंग खिलाडियों ने भी प्रतिभाग किया, और जीत भी दर्ज करायी। इसको लेकर समाचार भी प्रकाशित हुए, पर जिस बात ने ध्यान आकर्षित किया वह थी कि किराये की रायफल से शूटिंग कोच ने जीता स्वर्ण पदक। यह समाचार लचर व्यवस्था की पोल खोलती कम और प्रतिभागियों की प्रसंशा को केंद्रित ज्यादा करती हुई नजर आ रही थी। किन्तु यह समाचार यह भी दर्शाता है कि शासन के अलग अलग विभागों के बीच कोई समन्वय जैसी चीज होती ही नहीं है।
खेल आयोजनों पर चार सौ करोड़ से ज्यादा खर्च करने वाली उत्तराखंड सरकार के शूटिंग खिलाड़ियों को किराये की रायफल लेनी पड़ रही है, यह बात खेल मंत्रालय के साथ राज्य सरकार को भी निशाने पर ले लेती है। क्यों हल्द्वानी, जनपद नैनीताल के इन खिलाड़ियों या अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम के पास अपनी शूटिंग गन नहीं हैं, यह बड़ा सवाल है। क्या यही स्थिति पूरे राज्य भर की है, इस बात पर विचार करना तो बनता ही है।
राज सरकार कंगाल हो गई है या कुछ ही जगहों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहती है। सरकार कंगाल हो गई तो सैकड़ों करोड़ की घोषणाओं का औचित्य क्या है। कैसे खेल मंत्री रेखा आर्य के कुमाऊँ के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी महानगर में करोड़ों के निजी भवन निर्मित होते चले जा रहे हैं। कैसे हल्द्वानी में ही नए खेल छात्रावास के निर्माण की बात फाइलों में सरपट दौड़ रही है। ये सब कारण किसी बड़ी कूटरचना की तरफ इशारा करते हैं।
यूं तो हर राज्य सरकार के पास राष्ट्रीय बचत के कई मद होते हैं जिनसे हर नागरिक से किसी न किसी रूप में कुछ शुल्क लिया जाता है, जो किसी भी परिस्थिति से निकलने के लिए काफी होता है। पर असल सवाल तो मंशा का है। जनपद नैनीताल के स्टेडियम या प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को उपेक्षित रखने का है तो इसके कारण का भी खुलासा होना जरुरी जान पड़ता है।
वैसे तो कथित कंगाल सरकार के कई विभाग इन खिलाडियों को इन परिस्थितियों से बाहर निकाल सकते हैं मसलन खनन न्यास समिति आदि आदि, पर अभी बात करते हैं शूटिंग के सबसे करीबी विभाग, जहाँ जिलाधिकारी के अधीनस्थ कार्यालय में असलोंह के लाइसेंस बनते हैं। इस विभाग में कोई भी व्यक्ति जब निजी असलेह के लिए लाइसेंस बनाने जाता है तो उससे तीन तरह के शुल्क लिए जाते हैं जैसे सरकारी चालान, राष्ट्रीय बचत शुल्क और तीसरा है रायफल क्लब फंड। इसकी एक कमेटी होती है जसमें जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, ट्रेजरी अधिकारी शामिल होते हैं। जो मिलकर तय करते हैं कि किन जरूरतों के लिए इस कोष से कितना धन खर्च किया जाना है। लेकिन यह विवेक और मंशा की बात पर ही निर्भर करता है।
अब ये तमाम अधिकारीगण खेल और खेल प्रोत्साहन को कितना महत्त्व देते हैं, कितना स्वास्थ्य सम्बन्धी मानसिक और पर्यावरणीय प्रभावों को समझते हैं आदि आदि, यह सब इनके मस्तिष्क की संरचना और व्यवहार पर निर्भर करता है। अब इन किराये की रायफल से स्वर्ण पदक जितने वाले शूटिंग खिलाड़ियों पर सोच पाएंगे या नहीं, कह पाना मुश्किल है।