
डॉ विनीता पंत
मनोवैज्ञानिक एवं रिसर्चर
10 सितंबर को हम हर वर्ष आत्महत्या रोकथाम जागरूकता दिवस मनाते है लेकिन आत्महत्या आज भारत में गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। एनसीआरबी (2022) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में दर्ज आत्महत्याओं में सबसे बड़ी संख्या युवाओं की थी। 2018 से 2022 तक छात्रों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के केसेज में 44% की वृद्धि हुई।
सरकार की “Causes of Death in India: 2021 – 2023” रिपोर्ट (एस आर एस ) के अनुसार, 15–29 वर्ष के युवाओं में 17.3% मृत्यु आत्महत्या से होती है। यह सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर बीमारियों से भी अधिक है।
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ वैश्विक स्तर पर पुरुषों में आत्महत्या दर महिलाओं से कहीं अधिक होती है, वहीं भारत के युवाओं में पुरुष (17.0%) और महिलाएँ (17.8%) यानी लगभग समान खतरे में हैं।
यह आँकड़ा परिवार और समाज दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है कि भावनात्मक सहारे और आपसी संवाद की कमी युवाओं को सबसे बड़ी त्रासदी की ओर धकेल रही है।
रिपोर्ट्स यह भी बताते है कि आत्महत्या के करने में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कारण अधिक है।
परिवार का माहौल
शोध बताते हैं कि जिन युवाओं को घर में सहयोग और संवाद का माहौल बचपन से मिलता है, उनमें आत्महत्या का जोखिम कम होता है। वहीं, लगातार आलोचना, झगड़े और भावनात्मक दूरी आत्महत्या की संभावना बढ़ाते हैं। पबमेड और एनसीबीआई में छपे कुछ लेखों में पाया गया कि पारिवारिक कलह और संवादहीनता, डिप्रेशन और आत्महत्या के बड़े कारण हैं।
मनोविज्ञान के अनुसार बढ़ती उम्र के बच्चे को अपनी भावनाओं को समझना और इमोशनल बैलेंस बनाने की सीख देना जरूरी है। इसका अर्थ है कि जितना आप बच्चों के “आई क्यू” पर ध्यान देते हो उतना ही “ई क्यू” या इमोशनल इंटेलिजेंस पर भी देना चाहिए।
हाल की घटनाएँ-
हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक युवक की जान मेटा के अलर्ट सिस्टम से बच गई, क्योंकि समय रहते पुलिस ने हस्तक्षेप किया। इसके उलट, भोपाल में पापा की डांठ पर एक बच्ची की आत्महत्या ने समाज को हिला दिया। यूं तो आत्महत्या गंभीर विषय लगता है लेकिन दैनिक समाचारों को देखे तो पिछले कुछ दिनों में ही वेस्ट बंगाल के टेक युवक, छत्तीसगढ़ के एमबीबीएस छात्र, नोएडा के प्रतिष्ठित संस्थान के सीएस छात्र और दिल्ली के सी ए जैसे न जाने कितने केस सुनने को मिल जाते है परन्तु कही न कही सही समय पर बातचीत, परिवार में समझ और सहारा इन जानों को बचा सकता है।
क्या है कानून में उपलब्ध सेवाएँ?
भारत सरकार ने Mental Healthcare Act, 2017 के तहत आत्महत्या प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मौलिक अधिकार बनाया। साथ ही, “किरण” हेल्पलाइन (1800-599-0019) जैसी सेवा को शुरू किया जो 24 * 7 सहायता देती है। लेकिन इन हेल्पलाइनों की अपनी सीमाएँ हैं, इसलिए पहला सहारा हमेशा परिवार, दोस्त और साथी ही बनते है।
परिवार क्या कर सकता है?
इमोशंस को लंबे समय तक दबा कर रखना किसी ज्वालामुखी के फटने का इंतजार करने जैसा है इसलिए आवश्यक है समय समय पर इस भीतर के भार को बाहर निकालना और इसके लिए आपको चाहिए होता है कोई भरोसेमंद साथी। ऐसे में परिवार, दोस्तो या कोई अन्य खास परिचित लिस्ट टॉप पर आते है। इसलिए आवश्यक है कि परिवार ही ऐसा वातावरण दे कि बच्चे या कोई भी सदस्य सबसे पहले घर में ही इमोशंस के भार को खाली कर पाए।
ऐसे में आज के समय में बच्चों को समय देने के साथ साथ कुछ बातों का ध्यान देना पेरेंट्स के लिए आवश्यक बन गया है। परिवार को जरूरत है कि वो भी बच्चों से
रोज़मर्रा की बातचीत बढ़ाएँ – बच्चों से उनके दिन के बारे में सहज पूछें।
टोकने से पहले सुनें – आलोचना के बजाय धैर्यपूर्वक सुनना सबसे बड़ा सहारा है।
संकेत पहचानें – अचानक चुप्पी, व्यवहार में बदलाव या लंबी निराशा को नज़रअंदाज़ न करें।
विशेषज्ञ की मदद लें – ज़रूरत पड़ने पर काउंसलर या डॉक्टर तक पहुँचाने में झिझकें नहीं। यह सामान्य पेट दर्द दिखाने को डॉक्टर के पास जाने जैसा ही है।
सकारात्मक माहौल बनाएँ – परिवार में सहयोग, साझा गतिविधियाँ और खुलापन बच्चों को सुरक्षित महसूस कराते हैं।