
स्क्रीनिंग की धज्जियाँ, नियमों की तिरस्कार और कुलपति का दरबारी खेल!
देहरादून/ हल्द्वानी: जब सब कुछ स्क्रीन से परे हो जाए, तब स्क्रीनिंग कमेटी बस नाम की रह जाती है। जब चयन पहले हो चुका हो, तब इंटरव्यू सिर्फ़ एक अभिनय बन जाता है। और जब विश्वविद्यालयों में नियुक्तियाँ बौद्धिकता से ज़्यादा जुगाड़ पर आधारित हों, तब विद्यार्थियों को शिक्षकों से नहीं, तंत्र से डर लगने लगता है।
उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी में 2021 में हुई प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर की 25 नियुक्तियों पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सच्चिदानंद डबराल द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए 18 पन्नों के दस्तावेज़ी शिकायती पत्र में उन तमाम खामियों और अनियमितताओं का जिक्र है, जो इस घोटाले की जड़ में हैं।
महिलाओं को हटा कर चहेते बिठाए गए
30 प्रतिशत महिला आरक्षण को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करना कोई लापरवाही नहीं बल्कि एक साज़िश रही। नियमों के विपरीत रोस्टर लागू किया गया और कुछ विभागों में 100 प्रतिशत आरक्षण लागू कर, बाकी में कोई आरक्षण नहीं दिया गया। यही नहीं, विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा स्वीकृत आरक्षण रोस्टर तक को फेंक दिया गया।
स्क्रीनिंग कमेटी का कोई अस्तित्व बचा
विभिन्न पदों के लिए बनी स्क्रीनिंग कमेटी ने कई अभ्यर्थियों को अयोग्य ठहराया था। लेकिन कुलपति साहब ने नियमों का तमाशा बनाते हुए एक ‘ग्रीवांस कमेटी’ बना डाली। विश्वविद्यालय के नियमों में इस कमेटी का कोई ज़िक्र नहीं, लेकिन इसी के जरिए अयोग्य घोषित किए गए लोग योग्य बना दिए गए।
पीडी पंत की ‘विज्ञान कथा’: पद भी बदला, विषय भी बदला
पीडी पंत का नाम हर मोड़ पर सामने आता है। खुद प्रोफेसर पद के अभ्यर्थी थे, फिर भी ग्रीवांस कमेटी के सदस्य बने। मकेनिकल इंजीनियरिंग की पोस्ट को भूगर्भ विज्ञान में बदलने का प्रस्ताव भी उन्होंने ही रजिस्ट्रार बनकर भेजा। बाद में खुद उसी पद पर नियुक्त हो गए। भूगर्भ विज्ञान वो विषय है, जो विश्वविद्यालय में पढ़ाया ही नहीं जाता।
कमाल कि योग्यता की परिभाषा बदल दी गई
पीआरओ राकेश रयाल और प्रवेश सहगल को एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया गया, जबकि न तो उनके पास आवश्यक 8 वर्षों का अनुभव था, न ही यूजीसी द्वारा मान्यता प्राप्त जर्नलों में पर्याप्त शोधपत्र। कुछ शोध प्रीडेटरी जर्नलों में प्रकाशित हैं, जो फर्जी माने जाते हैं। राकेश रयाल का पीआरओ का अनुभव, दैनिक वेतनभोगी शिक्षक का अनुभव भी जोड़ दिया गया।
चयन से पहले ही तय थे नाम
डॉ. राजेश कुमार सिंह द्वारा नियुक्तियों से 7 महीने पहले राज्यपाल को भेजी गई शिकायत में उन्हीं 9 नामों का ज़िक्र था जो बाद में नियुक्त हुए। क्या यह संयोग है या सोची समझी साज़िश?
कुलपति की अदृश्य ताकत और कार्यपरिषद की चुप्पी
कार्यपरिषद की बैठकें मात्र मुहर लगाने की प्रक्रिया बन चुकी हैं। 8 अप्रैल 2022 की बैठक में अवैध नियुक्तियों को नियमित करने का प्रयास किया गया जबकि मामला कोर्ट में लंबित है। कार्यवाहक कुलपति को 6 महीने का सेवा विस्तार मिलना खुद में सवाल है।
कुल मिलाकर यहाँ सवाल वही है कि क्या ये विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या साजिश की प्रयोगशालाएँ? जब विश्वविद्यालयों में योग्यता से ज़्यादा संबंध मायने रखने लगते हैं, तब विद्यार्थियों को डिग्री नहीं, शर्म मिलती है। सरकार को तय करना है कि वह इस लापरवाही की साज़िश में हिस्सेदार बनेगी या सच के साथ खड़ी होगी।
डबराल की मांग
कुलपति ओपीएस नेगी को बर्खास्त कर उनके खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज किया जाए।
प्रोफेसर के पदों पर हुई सभी नियुक्तियों को रद्द कर नये सिरे से पारदर्शी प्रक्रिया शुरू की जाए।
पीडी पंत, राकेश रयाल, प्रवेश सहगल सहित सभी संदिग्धों पर मुकदमा दर्ज किया जाए।
कोर्ट का निर्णय आने तक कोई नियुक्ति पक्की न की जाए और दोषियों को प्रशासनिक पदों से हटाया जाए।
जवाबदेही से बच रहे अब माननीय
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत से इस अहम खबर पर प्रतिक्रिया लेने के लिए उनके मोबाईल नंबर 7900440055 पर चार बार कॉल की गई, वहीं उनके निजी सचिव राकेश नेगी के मोबाईल नम्बर 9917777702 पर भी तीन बार काल किया गया, लेकिन दोनों ही कॉल रिसीव नहीं हुईं। इस पर सवाल उठते हैं कि जब मंत्री जी पत्रकारों से संवाद नहीं कर पा रहे, तो आम जनता से संवाद कैसे संभव है?