
द्वाराहाट। पशु पालन के लिए यूं तो सरकार ने कई योजनाएँ चला रखी हैं पर आवारा पशुओं के संरक्षण के लिए भी धन कमाने के कई रास्ते खोले हुए हैं। जहाँ अधिकारियों की मिली भगत से बड़े बड़े निर्मम खेलों को अंजाम दिया जाता है। आवारा पशुओं में भी सबसे ज्यादा खेल गौ वंश के नाम पर होते आए हैं यही वजह है कि हर शहर और गांव में गौशालाओं की बाढ़ सी आगई है, जहाँ गायों का संरक्षण तो सिर्फ फाइलों में पर असल खेल मुनाफा कमाने का है।

ऐसा ही एक मामला सामने आया है द्वाराहाट के दूनागिरी से, जहाँ कथित गौशाला में गौ वंशिय पशु तड़प-तड़प के मरने को विवश हैं। यह गौशाला माँ दूनागिरी गौ रक्षा मिशन के नाम से चलाई जा रही है। जहाँ गौशाला के नाम पर कुछ पशु पौलीथिन के बाड़ों में बंद है तो कुछ तार बाड़ के बीच खुले आसमान में रहते नजर आजाएँगे। हैरानी की बात यह है कि यह गौशाला अप्रैल माह में बिना पंजीकरण के ही आनन फानन में खोल दी गई।द्वाराहाट विकासखंड अंतर्गत संचालित माँ दूनागिरी गौ सेवा मिशन, रटखाल की वर्तमान स्थिति अत्यंत चिंताजनक एवं गंभीर है। निरीक्षण के दौरान सामने आए तथ्यों ने गौ संरक्षण की व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी तथा अभिलेखों के रख-रखाव पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कई गाय बछड़े यहाँ मरणाशन हालात में पाए गए हैं अब यह किन अधिकारियों की देख रेख में गतिमान है यह भी जाँच का महत्वपूर्ण बिंदु है।

द्वाराहाट की ब्लॉक प्रमुख डॉ आरती किरौला ने इस संबंध में उपजिलाधिकारी को शिकायती पत्र भेजा है। जिसमें कई मांगों के साथ गंभीर सावल खडे किए हैं। जिसमें उन्होंने कहा है कि – निरिक्षण के दौरान 156 टैग लगी गायें देखने में आयी, जिनमें से 4 गायें गंभीर अवस्था में मौत की कगार पर पाई गई। उनकी स्थिति से साफ मालूम चल रहा था कि उन्हें पर्याप्त चारा, पीने योग्य पानी, समय पर उपचार आदि की कोई व्यवस्था नजर नहीं आई। यहाँ गौवंश के पंजीकरण के पर्चे तो मिले हैं पर उनके सत्यापन का मामला कहीं नजर नहीं आता।डॉ आरती ने इस विषय पर कई अभिलेखों पर सावल खडे किए हैं और उच्च स्तरीय जाँच की मांग की है और कहा है कि पशु क्रूरता अधिनियम 1960 तथा उत्तराखंड गौवंश अनुसार यहाँ प्रशासनिक दायित्व कहीं नजर नहीं आता।

इस मामले पर जब हमने उक्त संस्था के अध्यक्ष बहादुर सिंह से बात की तो उनका कहना था कि अभी 7 जुलाई को हमने संस्था का पंजीकरण कराया है लेकिन यह अप्रैल माह से काम कर रही है। जिस पर हमको अभी तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है, हाँ इतना जरूर होता है कि जो लोग अपनी गायें यहाँ छोड़ जाते हैं वो लोग वन टाइम पेमेंट कर जाते हैं जो 3 से 4 हजार ₹ के बीच होती है

इधर डॉ आरती ने सात बिन्दुओं पर प्रशासन को अपना मांग पत्र प्रेषित किया हुआ है।
1. इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
2. मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाए।
3. यह जांच की जाए कि अपंजीकृत गौशाला किन व्यक्तियों अथवा अधिकारियों के संरक्षण में संचालित हो रही थी तथा इसके लिए उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए।
4. गौ सदन द्वारा जारी समस्त अभिलेखों एवं पंजीकरण रिकॉर्ड का मिलान कर गौशाला में दर्ज प्रत्येक गौवंश का सत्यापन कराया जाए।5. जिन गौवंशों की मृत्यु हुई है, उनके मृत्यु पंजीकरण, पोस्टमार्टम (यदि कराया गया हो), शव निस्तारण एवं अन्य संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जाए।
6. यदि जांच में रिकॉर्ड में हेराफेरी, गंभीर लापरवाही, पशुओं के प्रति क्रूरता अथवा अन्य कानूनी उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित संस्था, अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए।
7. वर्तमान में गौशाला में मौजूद सभी गौवंश के लिए तत्काल पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी, चिकित्सकीय उपचार एवं सुरक्षित रख-रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में है, पर देखना यह है कि गायों के नाम पर चल रही समितियों को प्रशासन कितनी गंभीरता से जाँचता है।