
संजय रावत
हल्द्वानी। एफटीआई में सिविल निर्माण कार्यों के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग का बड़ा मामला सामने आ रहा है। जानकारी के मुताबिक संकेत मिल रहे हैं कि करीब 40 लाख के निर्माण कार्यों में पहले भुगतान बाद में काम का खेल चलाया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन तीन प्रमुख कार्यों मोनाल हॉस्टल के सामने कैफेटेरिया (10 लाख रुपये), मयूरी हॉस्टल का कॉमन रूम (10 लाख रुपये) और टेनिस व बैडमिंटन कोर्ट (20 लाख रुपये) पर यह रकम खर्च दिखाई गई है, उनमें से कई कार्य या तो अधूरे हैं या उनकी गुणवत्ता और प्रगति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ज्ञात हुआ है कि इन प्रोजेक्ट्स में बिना कार्य पूर्ण हुए ही ठेकेदारों को भुगतान जारी कर दिया गया। ये सभी निर्माण स्थल संस्थान के निदेशक कार्यालय से महज 50 मीटर के दायरे में स्थित हैं। ऐसे में यह सवाल और गहरा जाता है कि क्या यह महज लापरवाही है या फिर सुनियोजित अनदेखी? संस्थान के निदेशक संजीव चतुर्वेदी, जो सभी प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियों के लिए जिम्मेदार हैं, उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
सरकारी वित्तीय नियम साफ कहते हैं कि किसी भी निर्माण कार्य का भुगतान तभी किया जा सकता है जब वह कार्य पूर्ण हो और उसका तकनीकी सत्यापन हो जाए। ऐसे में अधूरे कार्यों पर भुगतान होना सीधे तौर पर नियमों की अनदेखी ही नहीं, बल्कि संभावित वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
मामले में अंदरखाने यह भी चर्चा है कि अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के बिना इस तरह का भुगतान संभव नहीं है। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल वित्तीय नियमों का उल्लंघन होगा, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला भी बनता है।
इस पूरे प्रकरण ने संस्थान की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
होना तो यह चाहिए कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच विजिलेंस या किसी अन्य सक्षम एजेंसी से कराई जाए और संबंधित कार्यों का तकनीकी व वित्तीय ऑडिट कराया जाए।
इस मामले पर जब हमने ठेकेदार मुकेश से भुगतान के विषय पर बात करनी चाही तो वो किसी न किसी बहाने दो दिन तक बात को टालते रहे।
क्या कहती है पड़ताल?
काम अधूरा, भुगतान पूरा तीन
प्रोजेक्ट में समान पैटर्न 40 लाख रुपये के खर्च पर पारदर्शिता का अभाव साफ नजर आता है। साइट की स्थिति और फाइलों के दावों में अंतर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खडे करता है, यदि समय रहते इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह प्रकरण सरकारी संस्थानों में चल रहे कागजों पर विकास के बड़े नेटवर्क की एक और कड़ी साबित हो सकता है।