
जब विकास की हर लकीर के नीचे दबने लगे जनहित के सवाल
संजय रावत
उत्तराखण्ड में बारिश होती है तो सरकारें छाता खोल लेती हैं और जनता आसमान देखने लगती है। पहाड़ दरकता है तो अधिकारी बताते हैं—यह प्राकृतिक आपदा है। नेता बताते हैं कि सरकार पूरी तरह मुस्तैद है। विशेषज्ञ बताते हैं—हिमालय संवेदनशील है।
जनता फिर वही सवाल पूछती है—हिमालय संवेदनशील है तो सरकार किस बात के प्रति संवेदनशील है?
यहां हर आपदा के साथ सरकारी शब्दावली भी लगभग तय है—अभूतपूर्व वर्षा, असामान्य परिस्थिति, प्राकृतिक आपदा, युद्धस्तर पर राहत और जल्द से जल्द पुनर्निर्माण। अजीब बात है कि बारिश हर साल होती है, पहाड़ वही हैं, नदियां वही हैं, लेकिन हर बार आपदा हमारे लिए नई होती है। शायद इसलिए कि आपदा की तैयारी पुरानी फाइलों में रखी रहती है।

पहाड़ ने पहले ही बता दिया था
पहाड़ चिल्लाकर नहीं बोलता। वह धीरे-धीरे दरकता है। पहले छोटी दरार आती है, फिर पत्थर गिरता है, सड़क टूटती है, रास्ता बंद होता है और किसी दिन पहाड़ का एक हिस्सा नीचे आ जाता है।
इसके बाद हम कहते हैं कि प्रकृति ने रौद्र रूप दिखाया।
प्रकृति बेचारी क्या करे? उसे तो सदियों से यही करते देखा गया है। हमने जंगल काटे, ढलानों पर भार बढ़ाया, नदियों के किनारे निर्माण किया और सड़कों के लिए पहाड़ों को चीर दिया। फिर जब पहाड़ ने आदतन थोड़ी-सी करवट ली तो उसे ही ‘रौद्र’ घोषित कर दिया।
हिमालय शायद पूछता होगा—मैं रौद्र हूं या तुम्हारी विकास नीति?
उत्तराखण्ड में विकास का एक आसान फार्मूला बन गया है—जहां पहाड़ दिखे, वहां सड़क चाहिए, जहां नदी दिखे, वहां परियोजना चाहिए और जहां खाली जमीन दिखे, वहां निर्माण।
और जहां स्थानीय आदमी दिखाई दे, वहां उसे समझाया जाए कि यह सब उसके ही हित में है।
जनहित बड़ा अद्भुत शब्द है। उसके नाम पर सड़क बनती है, बांध बनता है, होटल बनता है और कभी-कभी आदमी ही वहां से चला जाता है। फिर उसी जमीन पर बोर्ड लग जाता है—“यह परियोजना जनहित में है।

नदी से हमारी पुरानी नाराजगी है
नदी को हमने कभी ठीक से समझा ही नहीं। जब वह बहती है तो बिजली चाहिए। जब किनारे काटती है तो बाढ़ नियंत्रण चाहिए। जब रास्ता बदलती है तो तटबंध चाहिए। और जब वह हमारे बनाए रास्ते में बह जाती है तो उसे ‘आपदा’ कह दिया जाता है।
नदी को शायद सबसे ज्यादा आश्चर्य इसी बात पर होता होगा कि इंसान उसके किनारे बसकर भी उससे शिकायत करता है कि वह बहती क्यों है। नदी अपना रास्ता नहीं बदलती, अक्सर इंसान उसके रास्ते में आ खड़ा होता है।
2013 की चेतावनी और हमारी याददाश्त
2013 ने उत्तराखण्ड को ऐसा आईना दिखाया था जिसमें पानी के साथ हमारी विकास नीति भी दिखाई दे रही थी। लगा था कि अब पहाड़ की क्षमता समझी जाएगी, नदियों के रास्ते का सम्मान होगा और आपदा प्रबंधन फाइलों से निकलकर गांवों तक पहुंचेगा।
लेकिन हमारी राजनीतिक याददाश्त भी पहाड़ी बारिश जैसी है—कुछ दिन तेज, फिर धीरे-धीरे गायब।
आपदा गई, कैमरे गए, हेलीकॉप्टर गए, बयान गए और विकास फिर उसी पुराने रास्ते पर लौट आया।
EIA और SIA जैसी व्यवस्थाएं इसलिए हैं कि किसी परियोजना से पहले पहाड़, नदी, जंगल, स्थानीय आजीविका और विस्थापन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा जाए। लेकिन हमारे यहां कागज बहुत समझदार है। वह नदी की आवाज भी सुन लेता है, पहाड़ की स्थिरता भी जांच लेता है और जनता की सहमति भी प्राप्त कर लेता है। बस कभी-कभी गांव वाले खुद बता देते हैं कि उनसे पूछा ही नहीं गया।
कागज कहता है—सब ठीक है।
पहाड़ कहता है—कुछ ठीक नहीं है। नदी कहती है—मुझे रास्ता चाहिए। और फाइल कहती है— कार्य प्रगति पर है।

आपदा के बाद सरकार बहुत सक्रिय होती है
आपदा के बाद सरकार बहुत सक्रिय होती है।आपदा के बाद सरकार अचानक बहुत व्यस्त हो जाती है। बैठकें होती हैं, दौरे होते हैं, हेलीकॉप्टर उड़ते हैं, राहत सामग्री पहुंचती है, मुआवजे घोषित होते हैं और कैमरे सब रिकॉर्ड करते हैं।
जनता को लगता है कि सरकार उसके साथ खड़ी है।
वह यह नहीं देख पाती कि सरकार उसके साथ आपदा के बाद खड़ी हुई है।
आपदा से पहले वह कहां थी?
यह सवाल थोड़ा असुविधाजनक है। और असुविधाजनक सवालों का हमारे लोकतंत्र में सबसे आसान इलाज है—उन्हें अगली बैठक के लिए रख दीजिए।

नेपाल की तरफ देखिए…
अभी नेपाल में हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी अचानक आई बाढ़ ने एक बार फिर बता दिया है कि पहाड़ को समझे बिना उसके साथ विकास का प्रयोग कितना भारी पड़ सकता है।
नेपाल हमसे दूर नहीं है। हिमालय की कोई राजनीतिक सीमा नहीं होती।
वही हिमालय नेपाल में ग्लेशियर बनकर टूटता है तो उसकी गूंज उत्तराखण्ड तक आती है। वही हिमालय यहां पहाड़ बनकर दरकता है तो उसका मलबा हमारी विकास नीति की किताबों पर भी गिरता है। ग्लेशियर का टूटना प्राकृतिक हो सकता है, लेकिन तबाही का पैमाना हमेशा केवल प्राकृतिक नहीं होता। गर्म होता हिमालय, अस्थिर ग्लेशियर, बदलता मौसम और मानवीय हस्तक्षेप—इन सबको साथ रखकर देखना होगा।
नेपाल की त्रासदी को केवल नेपाल की खबर मान लेना आसान है। उसे उत्तराखण्ड के लिए चेतावनी मानना कठिन।
क्योंकि चेतावनी मान लेने के बाद फैसले बदलने पड़ते हैं।

पहाड़ आदमी से ज्यादा समझदार है
पहाड़ आदमी से ज्यादा समझदार हैं। उन्होंने ने कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। उसने कभी ट्वीट नहीं किया। उसने कभी यह दावा नहीं किया कि वह चौबीस घंटे निगरानी में है। वह बस खड़ा रहा।
फिर धीरे-धीरे उसने बता दिया कि उसकी भी एक सीमा है।
नदी ने कोई ज्ञापन नहीं दिया। वह बस बहती रही।
जंगल ने कोई आंदोलन नहीं किया। वह चुपचाप कम होता रहा। और गांव?
वह तो सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक निकला—पहले खाली हुआ, फिर उजड़ा और अंततः सरकारी रिपोर्ट में ‘पलायन प्रभावित क्षेत्र’ बन गया।
असली आपदा क्या है?
उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी आपदा बारिश नहीं है। भूस्खलन नहीं है। बाढ़ नहीं है। भूकंप भी नहीं।
ये प्रकृति की शक्तियां हैं, जिनसे मनुष्य को हमेशा सावधान रहना होगा।
असली आपदा तब शुरू होती है जब इन शक्तियों को जानते हुए भी ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो खतरे को बढ़ाएं।
जब पर्यावरण को विकास की बाधा माना जाए। जब स्थानीय आदमी की आपत्ति को पिछड़ेपन की निशानी समझा जाए।
जब EIA ( पर्यावराणीय प्रभाव आंकलन )और SIA (सामाजिक प्रभाव आँकालन ) को औपचारिकता और जनसुनवाई को रस्म बना दिया जाए। और जब हर विफलता के बाद एक ही वाक्य तैयार रहे—
“यह एक प्राकृतिक आपदा थी।”
प्राकृतिक आपदा थी, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन यदि नुकसान को कई गुना बढ़ाने में हमारी नीतियों की भूमिका थी तो उसे केवल प्राकृतिक कहना भी एक तरह की प्रशासनिक सुविधा है।
अब भी समय है
अब भी समय है उत्तराखण्ड को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें पहले पहाड़ कटे, फिर सड़क टूटे और अंत में बजट बढ़े।
ऐसा पर्यटन नहीं जिसमें पर्यटक आएं और स्थानीय लोग अपने ही गांव में जगह तलाशते फिरें। ऐसी परियोजनाएं नहीं जिनमें बिजली तो पैदा हो, लेकिन नदी का स्वभाव और गांव का भविष्य खत्म हो जाए।
हमें ऐसा उत्तराखण्ड चाहिए जिसमें विकास की पहली शर्त जीवन की सुरक्षा हो।
जहां सड़क पहाड़ को काटकर नहीं, पहाड़ को समझकर बने। जहां नदी को दुश्मन नहीं, जीवनरेखा माना जाए। जहां जंगल को जमीन का स्टॉक नहीं, भविष्य की सांस समझा जाए। जहां स्थानीय आदमी विकास का विषय हो, बाधा नहीं। विज्ञान की बेइंतिहां तरक्की के बावजूद प्रकृति को हराना संभव नहीं
हिमालय को आदेश देना संभव नहीं। नदी को हमेशा बांधकर रखना संभव नहीं। लेकिन अपनी नीतियां बदलना संभव है।
बस इसके लिए एक छोटी-सी दिक्कत है— इसके लिए पहाड़ को दोष देना बंद करना पड़ेगा। और शायद यही सबसे मुश्किल काम है। क्योंकि पहाड़ टूटने पर मलबा साफ करना आसान है—
नीतियों में जमा मलबा साफ करना थोड़ा मुश्किल है।