पहाड़ की पीठ पर विकास की लकीरें

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नदी को हमने कभी ठीक से समझा ही नहीं। जब वह बहती है तो बिजली चाहिए। जब किनारे काटती है तो बाढ़ नियंत्रण चाहिए। जब रास्ता बदलती है तो तटबंध चाहिए। और जब वह हमारे बनाए रास्ते में बह जाती है तो उसे ‘आपदा’ कह दिया जाता है।
नदी को शायद सबसे ज्यादा आश्चर्य इसी बात पर होता होगा कि इंसान उसके किनारे बसकर भी उससे शिकायत करता है कि वह बहती क्यों है। नदी अपना रास्ता नहीं बदलती, अक्सर इंसान उसके रास्ते में आ खड़ा होता है।


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