
संजय रावत
हल्द्वानी से एक खबर है। खबर नई नहीं है। तरीका नया है। ठगी पुरानी है, लालच भी पुराना है। लेकिन जब दोनों मिलते हैं, तो हर बार एक नया जाल बनता है इस बार उसका नाम है ऑनलाइन ट्रेडिंग। कुछ महीने पहले हल्द्वानी में जीएमएफएक्स नाम की एक ट्रेडिंग कम्पनी चर्चा में आई थी। चर्चा इसलिए नहीं कि उसने लोगों को अमीर बना दिया, बल्कि इसलिए कि उसने 39 करोड़ रुपये की कथित ठगी कर दी। मामला कुमाऊँ कमिश्नर दीपक रावत के दरबार तक पहुँचा। कम्पनी के एमडी विमल रावत को जेल जाना पड़ा। बताया जा रहा है कि वह अभी भी जेल में है। कम्पनी के कई कर्मचारियों पर भी आरोप लगे, लेकिन उन्होंने खुद को सिर्फ़ कमीशन पर काम करने वाला बताकर दूरी बना ली।
कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन ठगी की दुनिया में कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, वे रूप बदलती हैं। कुछ समय तक सन्नाटा रहा। फिर उसी सन्नाटे से एक नई आवाज़ निकली मेटा ट्रेड। नाम नया, तरीका वही, वादे पहले से बड़े। पहले 8 प्रतिशत महीने का लालच था, अब 22 प्रतिशत हो गया है। पहले सिर्फ़ मुनाफा था, अब उसके साथ थाइलैंड की मुफ्त यात्रा भी जुड़ गई है। इतना ही नहीं, इस कम्पनी ने कुछ निवेशकों को थाइलैंड घुमाकर यह भी साबित कर दिया कि सपना सच हो सकता है। यहीं से कहानी खतरनाक हो जाती है। हल्द्वानी, जिसे कुमाऊँ का प्रवेश द्वार कहा जाता है, इन दिनों इस मेटा ट्रेड नामक ट्रेडिंग स्कैम का नया केंद्र बनता जा रहा है। ठग अब फोन नहीं करते, वे ऐप बनाते हैं। व्हाट्सऐप ग्रुप बनाते हैं। आपको जोड़ते हैं। और फिर धीरे-धीरे आपका भरोसा जीतते हैं। आपको लगता है कि आप किसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में निवेश कर रहे हैं। स्क्रीन पर ग्राफ़ ऊपर जा रहा है। बैलेंस बढ़ रहा है। हर महीने 22 प्रतिशत रिटर्न का वादा है। 6 महीने में आपकी रकम डॉलर में बदल जाएगी। सुनने में अच्छा लगता है। इतना अच्छा कि सच लगने लगता है। लेकिन ज़रा ठहरिए। जब बैंक 6-7 प्रतिशत सालाना ब्याज देता है, तो कोई हर महीने 22 प्रतिशत कैसे देगा? यही वह सवाल है, जिसे ठगी कभी पूछने नहीं देती। शुरुआत में आपको मुनाफा दिखाया जाता है। कभी-कभी आपके खाते में थोड़ा पैसा भी आता है। आप खुश होते हैं देखो, सिस्टम काम कर रहा है। यहीं से खेल शुरू होता है। आप और पैसा लगाते हैं। बड़ा निवेश करते हैं। और फिर ऐप चलता रहता है, लेकिन आपका पैसा कहीं और चला जाता है। यह सिर्फ़ एक तकनीकी धोखा नहीं है। यह मनोविज्ञान का खेल है। व्हाट्सऐप ग्रुप में रोज़ स्क्रीनशॉट आते हैं। कोई कहता है मैंने 50 हज़ार लगाए थे, अब 2 लाख हो गए। कोई और लिखता है सर, आपने जिंदगी बदल दी। लेकिन ये लोग असली निवेशक नहीं होते, ये उसी स्क्रिप्ट का हिस्सा होते हैं, जो आपके लिए लिखी गई है। इस नेटवर्क का एक और पहलू है बेरोज़गार महिलाओं की भागीदारी। उन्हें इस चेन का हिस्सा बनाया जाता है। वे अपने जान-पहचान के लोगों से संपर्क करती हैं, भरोसा बनाती हैं और निवेश का प्रस्ताव देती हैं। बदले में उन्हें 6 से 8 प्रतिशत कमीशन मिलता है। ठगी अब सिर्फ़ ठगों तक सीमित नहीं रहती, वह रिश्तों के भीतर घुस जाती है। सबसे दिलचस्प और खतरनाक बात यह है कि ये प्लेटफॉर्म ऐसे नामों का इस्तेमाल करते हैं, जो विदेशी कंपनियों जैसे लगते हैं, या जिनका भारत में कोई वैध अस्तित्व ही नहीं है। निवेश को डॉलर में बदलने का दावा किया जाता है। लेकिन वह डॉलर भी स्क्रीन पर ही होता है, जेब में नहीं। अब सवाल वही है बचें कैसे? जवाब आसान है, लेकिन मानना मुश्किल। कोई भी निवेश जो बहुत अच्छा लगे, वह अक्सर सच नहीं होता। व्हाट्सऐप ग्रुप में दिखने वाला मुनाफा असली नहीं होता। और किसी भी ऐप या वेबसाइट पर पैसा लगाने से पहले उसकी सच्चाई जांचना आपकी जिम्मेदारी है। लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है। हम शॉर्टकट क्यों ढूंढ रहे हैं? जल्दी अमीर बनने की चाह क्यों इतनी तेज़ हो गई है? क्या हम मेहनत से ज्यादा भरोसा अब ऐप्स पर करने लगे हैं? हल्द्वानी की यह खबर सिर्फ़ हल्द्वानी की नहीं है। यह हर उस शहर की खबर है, जहाँ इंटरनेट है, स्मार्टफोन है और सपनों को जल्दी पूरा करने की बेचैनी है।
सवाल यह नहीं है कि ठग कितने चालाक हैं। सवाल यह है कि हम कब समझदार होंगे।